गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

एल-नीनो


एल-नीनो -एक परिचय

एल नीनो (अंग्रेज़ी: El Nino) प्रशांत महासागर के भूमध्यीय क्षेत्र की उस समुद्री घटना का नाम है, जो दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वाडोर और पेरु देशों के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतराल पर घटित होती है। यह समुद्र में होने वाली उथल-पुथल है और इससे समुद्र के सतही जल का ताप सामान्य से अधिक हो जाता है।
एल-नीनो स्पैनिश भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है- शिशु यानी छोटा बालक। वैज्ञानिक अर्थ में, एल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यीय क्षेत्र की उस समुद्री घटना का नाम है जो दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वाडोर और पेरु देशों के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतराल पर घटित होती है। यह समुद्र में होने वाली उथलपुथल है और इससे समुद्र के सतही जल का ताप सामान्य से अधिक हो जाता है। अक्सर इसकी शुरूआत दिसंबर में क्रिसमस के आस-पास होती है। ये ईसा मसीह के जन्म का समय है। और शायद इसी कारण इस घटना का नाम एल-नीनो पड़ गया जो शिशु ईसा का प्रतीक है।
जब समुद्र का सतही जल ज्यादा गर्म होने लगता है तो वह सतह पर ही रहता है। इस घटना के तहत समुद्र के नीचे का पानी ऊपर आने के प्राकृतिक क्रम में रुकावट पैदा होती है। सामान्यत: समुद्र में गहराई से ऊपर आने वाला जल अपने साथ काफी मात्रा में मछलियों के लिए खाद्य पदार्थ लाता है। यह क्रिया एल-नीनो के कारण रुक जाती है। इससे मछलियां मरने लगती हैं और मछुआरों के लिए यह समय सबसे दुखदायी होता है। एक बार शुरू होने पर यह प्रक्रिया कई सप्ताह या महीनों चलती है। एल-नीनो अक्सर दस साल में दो बार आती है और कभी-कभी तीन बार भी। एल-नीनो हवाओं के दिशा बदलने, कमजोर पड़ने तथा समुद्र के सतही जल के ताप में बढ़ोतरी की विशेष भूमिका निभाती है। एल-नीनो का एक प्रभाव यह होता है कि वर्षा के प्रमुख क्षेत्र बदल जाते हैं। परिणामस्वरूप विश्व के ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्यादा वर्षा होने लगती है। कभी-कभी इसके विपरीत भी होता है।
ऊष्ण कटिबंधीय प्रशांत में समुद्र तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में आये बदलाव को एल नीनो कहा जाता है जो पूरे विश्व के मौसम को अस्त-व्यस्त कर देता है। यह बार-बार घटित होने वाली मौसमी घटना है जो प्रमुख रूप से दक्षिण अमेरिका के प्रशान्त तट को प्रभावित करता है परंतु इस का समूचे विश्व के मौसम पर नाटकीय प्रभाव पड़ता है।
‘एल-नीनो’ के रूप में उच्चरित इस शब्द का स्पैनिश भाषा में अर्थ होता है ‘बालक’ एवं इसे ऐसा नाम पेरू के मछुआरों द्वारा बाल ईसा के नाम पर किया गया है क्योंकि ईसका प्रभाव सामान्यतः क्रिसमस के आस-पास अनुभव किया जाता है। इसमें प्रशांत महासागर का जल आवधिक रूप से गर्म होता है जिसका परिणाम मौसम की अत्यंतता के रूप में होता है। एल नीनो का सटीक कारण, तीव्रता एवं अवधि की सही-सही जानकारी नहीं है। गर्म एल नीनो की अवस्था सामान्यतः लगभग 8-10 महीनों तक बनी रहती है।

एलनीनो - एक प्राकृतिक भौगोलिक घटना

सामान्यतः, व्यापारिक हवाएं गर्म सतही जल को दक्षिण अमेरिकी तट से दूर ऑस्ट्रेलिया एवं फिलीपींस की ओर धकेलते हुए प्रशांत महासागर के किनारे-किनारे पश्चिम की ओर बहती है। पेरू के तट के पास जल ठंडा होता है एवं पोषक-तत्वों से समृद्ध होता है जो कि प्राथमिक उत्पादकों, विविध समुद्री पारिस्थिक तंत्रों एवं प्रमुख मछलियों को जीवन प्रदान करता है। एल नीनो के दौरान, व्यापारिक पवनें मध्य एवं पश्चिमी प्रशांत महासागर में शांत होती है। इससे गर्म जल को सतह पर जमा होने में मदद मिलती है जिसके कारण ठंडे जल के जमाव के कारण पैदा हुए पोषक तत्वों को नीचे खिसकना पड़ता है और प्लवक जीवों एवं अन्य जलीय जीवों जैसे मछलियों का नाश होता है तथा अनेक समुद्री पक्षियों को भोजन की कमी होती है। इसे एल नीनो प्रभाव कहा जाता है जोकि विश्वव्यापी मौसम पद्धतियों के विनाशकारी व्यवधानों के लिए जिम्मेदार है। 
अनेक विनाशों का कारण एल नीनो माना गया है, जैसे इंडोनेशिया में 1983 में पड़ा अकाल, सूखे के कारण ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग, कैलिफोर्निया में भारी बारिश एवं पेरू के तट पर एंकोवी मत्स्य क्षेत्र का विनाश। ऐसा माना जाता है कि 1982/83 के दौरान इसके कारण समूचे विश्व में 2000 व्यक्तियों की मौत हुई एवं 12 अरब डॉलर की हानि हुई।

एलनीनो के प्रभाव

1997/98 में इस का प्रभाव बहुत नुकसानदायी था। अमेरिका में बाढ़ से तबाही हुई, चीन में आंधी से नुकसान हुआ, ऑस्ट्रिया सूखे से झुलस गया एवं जंगली आग ने दक्षिण-पूर्व एशिया एवं ब्राजील के आंशिक भागों को जला डाला। इंडोनेशिया में पिछले 50 वर्षों में सबसे कठिन सूखे की स्थिति देखने में आई एवं मैक्सिको में 1881 के बाद पहली बार गौडालाजारा में बर्फबारी हुई। हिन्द महासागर में मानसूनी पवनों का चक्र इससे प्रभावित हुआ। 
जब प्रशांत महासागर में दबाव की उपस्थिति अत्यधिक हो जाती है तब यह हिन्द महासागर में अफ्रीका से ऑस्ट्रेलिया की ओर कम होने लगता है। यह प्रथम घटना थी जिससे यह पता चला कि ऊष्णकटिबंधी प्रशांत क्षेत्र के अन्दर तथा इसके बाहर आये परिवर्तन एक पृथक घटना नहीं बल्कि एक बहुत बड़े प्रदोलन के भाग के रूप में घटित हुए हैं।
स्त्रोत:
इंडिया वाटर पोर्टल

प्‍लास्टिक क्‍या है?

प्‍लास्टिक, पॉलिमर्स हैं जो कि ऐसे बडे़ अणु होते हैं जिनमें मोनोमर्स नामक रिपीटिंग यूनिट्स होती हैं। प्‍लास्टिक बैग की जब बात की जाती है तो रिपीटिंग यूनिट्स एथिलीन होती हैं। जब एथिलीन अणुओं को पॉलिथिलीन बनाने के लिए पॉजिमराइज्‍ड किया जाता है तो वे कार्बन अणुओं की एक लंबी श्रृंखला बनाते हैं। इनमें प्रत्‍येक कार्बन दो हाइड्रोजन अणुओं के साथ जुड़ा होता है।

प्‍लास्टिक के थैले किसके बनते हैं?

प्‍लास्टिक के थैले पॉलिमर्स के तीन प्रकारों में से एक द्वारा बनती हैं - पॉलिथिलीन- हाई डेंसिटी पॉलिथिलीन (एचडीपीई), लो डेंसिटी पॉलिथिलीन (एलडीपीई), या लीनियर लो-डेंसिटी पॉलिथिलीन (एलएलडीपीई)। किराने की थैलियां अधिकतर एचडीपीई द्वारा बनाई जाती हैं और थैले ड्राई क्‍लीनर एलडीपीई से। इन दोनों में सबसे बड़ा अंतर पॉलिमर श्रृंखला की ब्रांचिंग की डिग्री का है। एचडीपीई और एलएलडीपीई में रैखिक अशाखित श्रृंखला होती हैं वहीं एलडीपीई शाखित होती हैं।

कोपेनहेगन संयुक्त राष्ट्र मौसम परिवर्तन सम्मेलन

तापमान वृद्धि रोकने, उत्सर्जन घटाने तथा वित्त जुटाने का राजनीतिक समझौता
कोपेनहेगन में संयुक्त राष्ट्र मौसम परिवर्तन सम्मेलन, उत्सर्जन में अर्थपूर्ण कमी के लिए वैश्विक तापमान वृद्धि रोकने के लिए देशों के बीच समझौते तथा मौसम परिवर्तन से मुकाबले के लिए विकासशील दुनिया में गतिविधियां आरम्भ करने हेतु वित्त जुटाने की प्रतिबद्धता के साथ सम्पन्न हुआ।
सम्मेलन में विश्व के नेता ‘कोपेनहेगन’ समझौते पर सहमत हुए, जिसका अधिकांश देशों ने समर्थन किया। ‘कोपेनहेगन समझौता’ इस बात को मान्यता देता है कि मौसम परिवर्तन के सबसे खराब प्रभावों पर अंकुश लगाने के लिए वैश्विक तापमान में 2 डिग्री से कम की वृद्धि होनी चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, समझौता यह उल्लिखित करता है कि औद्योगीकृत देश अकेले या संयुक्त रूप से, 2020 से पूरे अर्थतंत्र में मापनेयोग्य उत्सर्जन लक्ष्यों को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध होंगे, जिन्हें 31 जनवरी 2010 से पहले समझौते में सूचीबद्ध किया जाना है।
बढते अर्थतंत्र वाले प्रमुख देशों के साथ कई विकासशील देशों ने प्रति दो वर्षों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन सीमित करने के उनके प्रयासों की जानकारी देने पर सहमति जताई, उनकी स्वैच्छिक शपथ को 31 जनवरी 2010 से पूर्व सूचीबद्ध करना है।

जलवायु परिवर्तन

हमें गर्मी के मौसम में गर्मी व सर्दी के मौसम में ठण्ड लगती है। ये सब कुछ मौसम में होने वाले बदलाव के कारण होता है। मौसम, किसी भी स्थान की औसत जलवायु होती है जिसे कुछ समयावधि के लिये वहां अनुभव किया जाता है। इस मौसम को तय करने वाले मानकों में वर्षा, सूर्य प्रकाश, हवा, नमी व तापमान प्रमुख हैं।
मौसम में बदलाव काफी जल्दी होता है लेकिन जलवायु में बदलाव आने में काफी समय लगता है और इसीलिये ये कम दिखाई देते हैं। इस समय पृथ्वी के जलवायु में परिवर्तन हो रहा है और सभी जीवित प्राणियों ने इस बदलाव के साथ सामंजस्य भी बैठा लिया है। 
परंतु, पिछले 150-200 वर्षों में ये जलवायु परिवर्तन इतनी तेजी से हुआ है कि प्राणी व वनस्पति जगत को इस बदलाव के साथ सामंजस्य बैठा पाने में मुश्किल हो रहा है। इस परिवर्तन के लिये एक प्रकार से मानवीय क्रिया-कलाप ही जिम्मेदार है।

जलवायु परिवर्तन के कारण

जलवायु परिवर्तन के कारणों को दो बागों में बांटा जा सकता है- प्राकृतिक व मानव निर्मित
I. प्राकृतिक कारण
जलवायु परिवर्तन के लिये अनेक प्राकृतिक कारण जिम्मेदार हैं। इनमें से प्रमुख हैं- महाद्वीपों का खिसकना, ज्वालामुखी, समुद्री तरंगें और धरती का घुमाव।
  • महाद्वीपों का खिसकना
हम आज जिन महाद्वीपों को देख रहे हैं, वे इस धरा की उत्पत्ति के साथ ही बने थे तथा इनपर समुद्र में तैरते रहने के कारण तथा वायु के प्रवाह के कारण इनका खिसकना निरंतर जारी है। इस प्रकार की हलचल से समुद्र में तरंगें व वायु प्रवाह उत्पन्न होता है। इस प्रकार के बदलावों से जलवायु में परिवर्तन होते हैं। इस प्रकार से महाद्वीपों का खिसकना आज भी जारी है।
  • ज्वालामुखी
जब भी कोई ज्वालामुखी फूटता है, वह काफी मात्रा में सल्फरडाई ऑक्साइड, पानी, धूलकण और राख के कणों का वातावरण में उत्सर्जन करता है। भले ही ज्वालामुखी थोड़े दिनों तक ही काम करें लेकिन इस दौरान काफी ज्यादा मात्रा में निकली हुई गैसें, जलवायु को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है। गैस व धूल कण सूर्य की किरणों का मार्ग अवरूद्ध कर देते हैं, फलस्वरूप वातावरण का तापमान कम हो जाता है।
  • पृथ्वी का झुकाव
धरती 23.5 डिग्री के कोण पर, अपनी कक्षा में झुकी हुई है। इसके इस झुकाव में परिवर्तन से मौसम के क्रम में परिवर्तन होता है। अधिक झुकाव का अर्थ है अधिक गर्मी व अधिक सर्दी और कम झुकाव का अर्थ है कम मात्रा में गर्मी व साधारण सर्दी।
  • समुद्री तरंगें
समुद्र, जलवायु का एक प्रमुख भाग है। वे पृथ्वी के 71 प्रतिशत भाग पर फैले हुए हैं। समुद्र द्वारा पृथ्वी की सतह की अपेक्षा दुगुनी दर से सूर्य की किरणों का अवशोषण किया जाता है। समुद्री तरंगों के माध्यम से संपूर्ण पृथ्वी पर काफी बड़ी मात्रा में ऊष्मा का प्रसार होता है।
II. मानवीय कारण
ग्रीन हाउस प्रभाव
पृथ्वी द्वारा सूर्य से ऊर्जा ग्रहण की जाती है जिसके चलते धरती की सतह गर्म हो जाती है। जब ये ऊर्जा वातावरण से होकर गुज़रती है, तो कुछ मात्रा में, लगभग 30 प्रतिशत ऊर्जा वातावरण में ही रह जाती है। इस ऊर्जा का कुछ भाग धरती की सतह तथा समुद्र के ज़रिये परावर्तित होकर पुनः वातावरण में चला जाता है। वातावरण की कुछ गैसों द्वारा पूरी पृथ्वी पर एक परत सी बना ली जाती है व वे इस ऊर्जा का कुछ भाग भी सोख लेते हैं। इन गैसों में शामिल होती है कार्बन डाईऑक्साइड, मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइड व जल कण, जो वातावरण के 1 प्रतिशत से भी कम भाग में होते है। इन गैसों को ग्रीन हाउस गैसें भी कहते हैं। जिस प्रकार से हरे रंग का कांच ऊष्मा को अन्दर आने से रोकता है, कुछ इसी प्रकार से ये गैसें, पृथ्वी के ऊपर एक परत बनाकर अधिक ऊष्मा से इसकी रक्षा करती है। इसी कारण इसे ग्रीन हाउस प्रभाव कहा जाता है।
ग्रीन हाउस प्रभाव को सबसे पहले फ्रांस के वैज्ञानिक जीन बैप्टिस्ट फुरियर ने पहचाना था। इन्होंने ग्रीन हाउस व वातावरण में होने वाले समान कार्य के मध्य संबंध को दर्शाया था।
ग्रीन हाउस गैसों की परत पृथ्वी पर इसकी उत्पत्ति के समय से है। चूंकि अधिक मानवीय क्रिया-कलापों के कारण इस प्रकार की अधिकाधिक गैसें वातावरण में छोड़ी जा रही है जिससे ये परत मोटी होती जा रही है व प्राकृतिक ग्रीन हाउस का प्रभाव समाप्त हो रहा है।
कार्बन डाईऑक्साइड तब बनती है जब हम किसी भी प्रकार का ईंधन जलाते हैं, जैसे- कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस आदि। इसके बाद हम वृक्षों को भी नष्ट कर रहे है, ऐसे में वृक्षों में संचित कार्बन डाईऑक्साइड भी वातावरण में जा मिलती है। खेती के कामों में वृद्धि, ज़मीन के उपयोग में विविधता व अन्य कई स्रोतों के कारण वातावरण में मिथेन और नाइट्रस ऑक्साइड गैस का स्राव भी अधिक मात्रा में होता है। औद्योगिक कारणों से भी नवीन ग्रीन हाउस प्रभाव की गैसें वातावरण में स्रावित हो रही है, जैसे क्लोरोफ्लोरोकार्बन, जबकि ऑटोमोबाईल से निकलने वाले धुंए के कारण ओज़ोन परत के निर्माण से संबद्ध गैसें निकलती है। इस प्रकार के परिवर्तनों से सामान्यतः वैश्विक तापन अथवा जलवायु में परिवर्तन जैसे परिणाम परिलक्षित होते हैं।
हम ग्रीन हाउस गैसों में किस प्रकार अपना योगदान देते हैं?
  • कोयला, पेट्रोल आदि जीवाष्म ईंधन का उपयोग कर
  • अधिक ज़मीन की चाहत में हम पेड़ों को काटकर
  • अपघटित न हो सकने वाले समान अर्थात प्लास्टिक का अधिकाधिक उपयोग कर
  • खेती में उर्वरक व कीटनाशकों का अधिकाधिक प्रयोग कर

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

जलवायु परिवर्तन से मानव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 19 वीं सदी के बाद से पृथ्वी की सतह का सकल तापमान 03 से 06 डिग्री तक बढ़ ग़या है। ये तापमान में वृद्धि के आंकड़े हमें मामूली लग सकते हैं लेकिन ये आगे चलकर महाविनाश को आकार देंगे, जैसा कि नीचे बताया गया है-
(क) खेती
बढ़ती जनसंख्या के कारण भोजन की मांग में भी वृद्धि हुई है। इससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बनता है। जलवायु में परिवर्तन का सीधा प्रभाव खेती पर पडेग़ा क्योंकि तापमान, वर्षा आदि में बदलाव आने से मिट्टी की क्षमता, कीटाणु और फैलने वाली बीमारियां अपने सामान्य तरीके से अलग प्रसारित होंगी। यह भी कहा जा रहा है कि भारत में दलहन का उत्पादन कम हो रहा है। अति जलवायु परिवर्तन जैसे तापमान में वृद्धि के परिमाणस्वरूप आने वाले बाढ़ आदि से खेती का नुकसान बढ़ेगा।
(ख) मौसम 
गर्म मौसम होने से वर्षा का चक्र प्रभावित होता है, इससे बाढ़ या सूखे का खतरा भी हो सकता है, ध्रुवीय ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र के स्तर में वृद्धि की भी आशंका हो सकती है। पिछले वर्ष के तूफानों व बवंडरों ने अप्रत्यक्ष रूप से इसके संकेत दे दिये है।
(ग) समुद्र के जल-स्तर में वृद्धि
जलवायु परिवर्तन का एक और प्रमुख कारक है समुद्र के जल-स्तर में वृद्धि। समुद्र के गर्म होने, ग्लेशियरों के पिघलने से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाली आधी सदी के भीतर समुद्र के जल-स्तर में लगभग आधे मीटर की वृद्धि होगी। समुद्र के स्तर में वृद्धि होने के अनेकानेक दुष्परिणाम सामने आएंगे जैसे तटीय क्षेत्रों की बर्बादी, ज़मीन का पानी में जाना, बाढ़, मिट्टी का अपरदन, खारे पानी के दुष्परिणाम आदि। इससे तटीय जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा, खेती, पेय जल, मत्स्य पालन व मानव बसाव तहस नहस हो जाएगी।
(घ) स्वास्थ्य
वैश्विक ताप का मानवीय स्वास्थ्य पर भी सीधा असर होगा, इससे गर्मी से संबंधित बीमारियां, निर्जलीकरण, संक्रामक बीमारियों का प्रसार, कुपोषण और मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव होगा।
(ङ) जंगल और वन्य जीवन 
प्राणी व पशु, ये प्राकृतिक वातावरण में रहने वाले हैं व ये जलवायु परिवर्तन के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं। यदि जलवायु में परिवर्तन का ये दौर इसी प्रकार से चलता रहा, तो कई जानवर व पौधे समाप्ति की कगार पर पहुंच जाएंगे।

सुरक्षात्मक उपाय

  • जीवाष्म ईंधन के उपयोग में कमी की जाए
  • प्राकृतिक ऊर्जा के स्रोतों को अपनाया जाए, जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि
  • पेड़ों को बचाया जाए व अधिक वृक्षारोपण किया जाए
  • प्लास्टिक जैसे अपघटन में कठिन व असंभव पदार्थ का उपयोग न किया जाए

वाटर फुटप्रिंट-एक परिचय

पर्यावरण के प्रति जागरुकता और उसके बचाने के प्रयासों के बीच पर्यावरणीय क्षति को प्रत्येक मानव के स्तर पर जानने के प्रयास जारी है। कार्बन की खपत का पता लगाने के लिए कार्बन फुटप्रिंट की अवधारणा का विकास किया गया। इसी प्रकार विभिन्न मानवीय गतिविधियों की संलग्नता के अनुसार पानी की प्रति मानव के अनुसार खपत पता लगाने के लिए वाटर फुटप्रिंट की अवधारणा प्रकाश में आई जिसकी जानकारी यहाँ दी जा रही है।
परिचय
अपने वाटर फुटप्रिंट की गणना कर, आप पता लगा सकते हैं कि आपकी जिंदगी जीने के तरीके से विश्व के जल स्रोतों की कैसे खपत हो रही है। हालाँकि अभी भी बहुत से पश्चिमी देशों में पानी की अधिकांश प्रचुरता है, हमारे प्रतिदिन के बहुत से उत्पादों में आभासी या छुपा जल शामिल होता है। आभासी पानी का उपभोग उन देशों में किया जाता है जहाँ पानी की कमी है। उदाहरण के लिए, एक कप कॉफी के उत्पादन में प्रयोग किए जाने वाले आभासी पानी की मात्रा 140 लीटर तक होती है। आपके वाटर फुटप्रिंट केवल आपके द्वारा प्रयोग किए गए प्रत्यक्ष पानी (उदाहरण के लिए, धुलाई में) को ही नहीं दिखाते, बल्कि आपके द्वारा उपभोग किए गए आभासी पानी की मात्रा को भी दर्शाते हैं।
आपका वाटर फुटप्रिंट
...जितना आप सोचते हैं उससे कहीं अधिक है... केवल पीने के लिए, नहाने के लिए या कपड़े धोने के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी ही आपके खाते में नहीं आता। आप जो कपड़े, जूते पहनते हैं, ईंधन इस्तेमाल करते हैं, उसके निर्माण में लगने वाला पानी भी आपके द्वारा की गई खपत में जुड़ता है। प्रतिदिन आप कितना पानी इस्तेमाल कर रहे हैं, इसकी जानकारी होना बेहद जरूरी है। देखिए, किन चीजों में कितना पानी खर्च हो रहा है और क्या है आपका वॉटर फुटप्रिंट।

Water Foot Print
वैश्विक ताप वृद्धि क्या है ?
सरल शब्दों में वैश्विक तापवृद्धि या ग्लोबल वार्मिंग का मतलब है, धरती के औसत तापमान में बढ़ोतरी हो जाना, ये दरअसल इंसानी गतिविधियों के कारण हुआ माना जाता है, जैसे कि जीवाश्म आधारित इंधन पेट्रोल, डीजल का अत्यधिक इस्तेमाल, जंगलों की कटाई, क्लोरो फ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन और अन्य अनेकों तरीकों से पारंपरिक ऊर्जा का अत्यधिक उपयोग और बर्बादी. इन सबका सीधा एक ही मतलब है कि प्राकृतिक संसाधनों के अत्यदिक उपयोग से वैश्विक तापमान वृद्धि का सम्बन्ध है. जीवाश्म इंधनों के जलने से कार्बन डाई-आक्साइड सहित अन्य हानिकारक गैसें वायुमंडल में बढ़ती जाती हैं. ये गैसें धरती के तापमान को बढाती हैं. इस कारण गर्मी का मौसम पहले की तुलना में अधिक गर्म होता जा रहा है, समुद्र जल स्तर बढ़ता जा रहा है, और ध्रुवों पर बर्फ पिघल रही है.

रविवार, 24 अगस्त 2014

ias 2014 first paper ans key


IAS 2014 Prelim II paper (paper set c)

IAS 2014 Prelim II paper 
आनंद एकडमी १०२/४२/६ जवाहर लाल नेहरू रोड इलाहाबाद  पारवती हॉस्पिटल के बगल 
(बालसन चौराहा )
फ़ो 9450961843
answer key Paper set C
1 c                     41 b
2 c                     42 a
3 c                     43 c
4 c                     44 c
5 b                    45 d
6 c                    46 b
7 b                    47 a
8 b                    48 d
9 d                    49 b
10 d                  50 c
11 d                  51 c
12 d                  52 b
13 d                  53 b
14 a                  54 c
15 d                  55 a
16 c                  56 a
17 b                  57 c
18 a                  58 b
19                     59 a
20                     60 c
21                     61 c
22                     62 b
23                     63 b
24                     64 c
25 c                  65 d
26 c                  66 b
27 a                  67 d
28 c                  68 c
29 b                  69 b
30 a                  70 c
31 c                  71 d
32 c                  72 a
33 a                  73 d
34 d                  74 b
35 b                  75 b
36 d                  76 a
37 b                  77 c
38 b                  78 c
39 b                  79 c

40 c                  80 a

ias 2014 Prelim Ans key first paper by anand academy


स्तनपान : स्वास्थ्यवर्द्धक और जीवनरक्षक पहल

साभार पत्र सूचना कार्यालय भारत सरकार
स्तनपान : स्वास्थ्यवर्द्धक और जीवनरक्षक पहल 
लेख
स्तनपान सप्ताह – 1 से 7 अगस्त, 2014
डॉ. संतोष जैन पासी*
डॉ. वंदना सभरवाल**
सुश्री आकांक्षा जैन***

      प्रत्येक बच्चे को जीवन के शुरूआती वर्षों में उचित शारीरिक वृद्धि और विकास के लिए पर्याप्त पोषण, उचित देखभाल, प्यार और स्नेह की जरूरत होती है। स्तनपान न केवल शिशुकाल/बचपन के दौरान बल्कि बाद के वर्षों में भी उसके स्वस्थ जीवन की नींव रखता है। 6 मास का होने तक बच्चे को केवल मां का दूध पिलाए जाने की जरूरत है, इसके अलावा उसे कुछ और नहीं पिलाया जाना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार केवल टॉनिक या पूरक दवाइयां दी जा सकती हैं।
      जीवन के पहले 6 महीनों में मां का दूध शिशु को वे सभी पोषण तत्व उपलब्ध कराता है, जो उसके अधिकतम विकास और वृद्धि के लिए जरूरी होते हैं। इसलिए शिशु को पहले 6 महीनों के दौरान केवल स्तनपान कराया जाना चाहिए, अर्थात बच्चा केवल मां के दूध पर ही निर्भर रहे, उसे अन्य कोई तरल पदार्थ यहां तक की पानी भी नहीं पिलाया जाना चाहिए। पोषण के अलावा स्तनपान का सबसे मूल्यवान योगदान यह है कि इससे मां और बच्चे के बीच स्थायी सकारात्मक संबंध विकसित होते हैं, जिससे शिशु का भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक विकास उसके मस्तिष्क वृद्धि पर सीधे ही प्रत्यक्ष प्रभाव डालने में सहायक होता है। स्तनपान शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास को तेजी से बढ़ाता है। 6 माह की आयु के बाद बच्चे को पर्याप्त तथा सुरक्षित पूरक खाद्य पदार्थ खिलाना आवश्यक हो जाता है, ताकि बच्चे की पोषक जरूरतों और स्तनपान के द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे पोषक तत्वों के मध्य अंतर को पूरा किया जा सके। इस प्रकार पहले 6 महीनों में स्तनपान समय पर शुरू करने और उसे केवल स्तनपान ही कराने के साथ-साथ 6 माह की उम्र के बाद पूरक पदार्थ खिलाने के साथ-साथ स्तनपान भी जारी रखना किसी बच्चे की उचित वृद्धि और विकास के प्रमुख आधार हैं। अगर बच्चे स्वस्थ हैं तो पूरा देश स्वस्थ है, जिससे देश की उत्पादकता और आर्थिक वृद्धि में सुधार होता है।
      नवजात, शिशु और नन्हें-मुन्नों के लिए स्तनपान पोषण का एक प्राकृतिक और सस्ता तरीका है। कृत्रिम/टॉप पोषण की तुलना में स्तनपान कराना बहुत सस्ता है, जिससे घर के बजट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। स्तनपान मानसिक विकास बढ़ाने के साथ-साथ बच्चे की सीखने के कार्य में वृद्धि करता है और वैश्विक प्राथमिक शिक्षा को आसान बनाने में मदद करता है। इससे बच्चे को जीवन में एक अच्छी शुरूआत मिलती है और लिंग भेद समाप्त होता है। स्तनपान कराने से जीवन के पहले वर्ष में बच्चों की मृत्यु दर कम से कम 13 प्रतिशत कम हो जाती है।
इससे जीवन के पहले साल में शिशु मृत्‍यु दर की संभावनाएं तकरीबन 13 फीसदी घट जाती हैं। इससे अगली बार गर्भधारण का खतरा भी घट जाता है और इस तरह इससे दो बार गर्भधारण के बीच के अंतराल को बढ़ाने में मदद मिलती है। अगर किसी शिशु को उसके जीवन के प्रथम छह माह के दौरान केवल स्‍तनपान कराया जाए तो सं‍‍क्रमित मां से बच्‍चे को एचआईवी का प्रसार होने के आसार कम हो जाते हैं। स्‍तनपान से औषधि, प्‍लास्टिक और अल्‍यूमीनियम कचरे का उत्‍पादन घटाने में मदद मिलती है और इससे पर्यावरण में निरंतरता सुनिश्चित होती है। यही नहीं, इससे सामुदायिक भागीदारी को भी बढ़ावा मिलता है क्‍योंकि विभिन्‍न क्षेत्रों, विशेषज्ञता और अनुभव वाले लोग एक साझा लक्ष्‍य पाने के लिए काम करते हैं।
विश्‍व भर में हर साल जन्‍म लेने वाले 13.5 करोड़ बच्‍चों में से 60 फीसदी को पर्याप्‍त स्‍तनपान सुलभ नहीं हो पाता है। अपर्याप्‍त स्‍तनपान के चलते जो कीमत चुकानी पड़ती है वह बेहद ज्‍यादा होती है। अपर्याप्‍त स्‍तनपान अर्थशास्‍त्र के अलावा शिशु/बाल मृत्‍यु दर, संक्रमण और समुदाय की मानसिक व सामाजिक सोच को प्रभावित करने वाली बीमारियों के जोखिम से भी जुड़ा हुआ है।
वहीं, दूसरी ओर जिन शिशुओं को उनके जीवन के प्रथम छह माह के दौरान अच्‍छा-खासा स्‍तनपान नसीब होता है, उन्‍हें उन बच्‍चों के मुकाबले मधुमेह, हाइपरटेंशन जैसी गैर-संक्रमणीय बीमारियां होने का खतरा काफी कम रहता है जिन्‍हें या तो बिल्‍कुल भी नहीं अथवा अपर्याप्‍त स्‍तनपान सुलभ होता है। पर्याप्‍त स्‍तनपान का लाभ बच्‍चों को बड़े होने के बाद भी यानी प्रौढ़ावस्‍था/वृद्धावस्‍था के दौरान भी मिलता है।
यह वाकई संयोग ही है कि स्‍तनपान और पूरक पोषण उन सभी आठ मिलेनियम डेवलपमेंट गोल (एमडीजी) से जुड़े हुए हैं जो तकरीबन दो दशक पहले (1990) विभिन्‍न सरकारों और संयुक्‍त राष्‍ट्र द्वारा वर्ष 2015 तक गरीबी से लड़ने और सतत विकास सुनिश्चित करने के‍ लिए तय किए गए थे। अत: स्‍तनपान को संरक्षण, बढ़ावा और समर्थन देकर हममें से सभी अपने बच्‍चों की अच्‍छी सेहत सुनिश्चित कर एमडीजी को पाने और इस तरह अपने राष्‍ट्र के समग्र विकास में काफी हद तक योगदान दे सकते हैं।
हालांकि समुचित स्तनपान और पूरक पोषण के ज्ञान को व्‍यवहार में तभी लाया जा सकता है जब माताओं, उनके पतियों, अन्‍य पारिवारिक सदस्‍यों, खासकर सास और इस तरह से पूरे समुदाय की सोच में वास्‍तविक बदलाव आयेगा। पर्याप्‍त स्‍तनपान और पूरक पोषण की सोच को विकसित करने के लिए माताओं के भरोसे को सही अर्थों में बढ़ाना होगा ताकि वे अपने बच्‍चों को सफलतापूर्वक स्‍तनपान करा सकें। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि पिता/अन्‍य पारिवारिक सदस्‍यों की ओर से समुचित समर्थन सुनिश्चित कर, कामकाज की स्थितियां बेहतर कर और घरेलू जिम्‍मेदारियां कम करके माताओं के लिए सही माहौल बनाया जाए। इससे अपने बच्‍चों की सेवा में जुटी माताएं स्‍तनपान के लिए पर्याप्‍त समय दे सकेंगी। अगर कोई मां अपर्याप्‍त स्‍तनपान की समस्‍या से जूझ रही है अथवा उसे बच्‍चे को स्‍तनपान कराने में दिक्‍कत आती है तो उसे डॉक्‍टर अथवा स्‍तनपान कराने वाली अन्‍य महिलाओं से सलाह-मशविरा करना चाहिए ताकि उसे इस काम में विफलता हाथ न लगे और यह प्रक्रिया सतत जारी रहे। जहां तक कामकाजी माताओं का सवाल है, उन्‍हें पर्याप्‍त मातृत्‍व लाभ देने और उनके लिए विस्‍तृत छुट्टियां (जहां आवश्‍यक हो) सुनिश्चित करने की जरूरत है। इस संदर्भ में शिशु की देखभाल के लिए अवकाश देने की सरकारी पहल वाकई उत्‍कृष्‍ट कदम है। हालांकि लाभार्थियों को इस सुविधा का इस्‍तेमाल काफी सोच-समझ कर करना चाहिए।
      उन माताओं में जो शिक्षित हैं, घर से बाहर काम करती हैं और उच्‍च/बेहद उच्‍च धनी वर्गों से ताल्‍लुक रखती हैं, स्‍तनपान बंद करने या जरूरत से कम स्‍तनपान कराने की संभावन ज्‍यादा रहती है। बहरहाल, समृद्ध भद्र वर्ग से जुड़ी दूसरी समस्‍यायें हैं। ज्‍यादातर माताएं जानबूझकर 6 महीने से पहले स्‍तनपान बंद कर देती हैं क्‍योंकि वे महसूस करती हैं कि लम्‍बे समय तक स्‍तनपान कराने से उनकी अपनी सेहत पर प्रभाव प़ड सकता है क्‍योंकि उन्‍हें अपने शिशु से जुड़ा रहना पडेगा। अपर्याप्‍त स्‍तनपान की वजह से समय से पहले ही पूरक दूध/स्‍तनपान विकल्‍प लागू कर देना पडता है जिससे मां की भूमिका और नवजात शिशु देखभाल पद्धति में परिवर्तन आ जाता है। वास्‍तव में, यह सब आज तेजी से बदलती आधुनिक जिंदगी की जटिलताओं की वजह से होता है बजाए अपर्याप्‍त स्‍तन दुग्‍ध उत्‍पादन के। दुनियाभर में अनुसंधानकर्ताओं ने यह साबित किया है कि ज्‍यादातर माताएं अपने शिशुओं को पर्याप्‍त दूध पिलाने में सक्षम हैं और यह भावना कि उनका दूध पर्याप्‍त नहीं है अकसर अन्‍य कारणों से आती हैं जिसमें एक स्‍तन से आंशिक दुग्‍धपान, स्‍तन पर शिशु की गलत अवस्‍था, स्‍तनाग्र की सूखी अवस्‍था, स्‍तनपान कराने वाली दो कडि़यों के बीच लम्‍बा अंतर आदि शामिल हैं। इसके अलावा माता-पिता/माताएं व्‍यवसायी रूप से उत्‍पादित शिशु दूध/नवजात आहारों के लुभावने विज्ञापनों के बहकावे में आ जाती हैं और स्‍तन, दुग्‍ध विकल्‍पों पर उनकी निर्भरता स्‍तनपान की लागत को बढ़ा देती हैं। इन व्‍यावसायिक नवजात फॉर्मूले के लिए वरीयता कई बार चिकित्‍सकों की अनुशंसाओं से भी प्रभावित होती हैं क्‍योंकि उनमें से कई चिकित्‍सक लगातार इन आहारों की अनुशंसा करते हैं और दावा करते हैं कि व्‍यावसायिक नवजात दुग्‍ध/आहार उनके शिशु को बेहतर पोषण मुहैया कराने में सहायक होगा। इसके अतिरिक्‍त, बदलती जीवन शैली और कामकाजी महिलाओं की बढ़ती संख्‍या, जो अपने पेशे में सफल होना चाहती हैं, खुद ही सुविधाजनक शिशु आहार विकल्‍प के लिए व्‍यावसायिक नवजात दुग्‍ध/आहारों को बढ़ावा देती हैं। शिक्षित, भद्र महिलाओं के लिए ध्‍यान रखने की एक बात है। याद रखिए.....अधिकतम स्‍तनपान और पूरक आहार अपनाना आपके शिशुओं की पौष्टिकता, सेहत, शारीरिक तथा मानसिक वृद्धि, भावनात्‍मक और सामाजिक विकास के लिए आपका एक निवेश है और इस प्रकार जीवनभर के लिए उसके व्‍यक्तित्‍व के समग्र विकास के लिए जरूरी है।
      माताओं को अधिकतम नवजात आहार प्रचलन को बनाये रखने के प्रति काफी जागरूक रहने की जरूरत है। स्‍तन, दुग्‍ध की अपर्याप्‍तता कामकाज के व्‍यस्‍त कार्यक्रमों जैसे रोजाना की छोटी समस्‍याओं को अभिनव रणनीतियों के जरिये दूर करने की जरूरत है जिसका क्रियान्‍वयन जरूरत के हिसाब से किया जा सकता है। इसके अतिरिक्‍त पिता और परिवार के अन्‍य सदस्‍यों का पर्याप्‍त सहयोग भी बहुत महत्‍वपूर्ण है। माता की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक बेहतरी तथा माता तथा शिशु के बीच बेहतर मेलजोल का माता के दूध पिलाने के प्रदर्शन पर काफी सकारात्‍मक प्रभाव पडता है। इसलिए, यह आवश्‍यक है कि माता को सही प्रकार का वातावरण, खासकर तनाव मुक्‍त माहौल मुहैया कराया जाये जिससे कि वह सफलतापूर्वक बच्‍चे को स्‍तनपान करा सके। व्‍यावसायिक रूप से प्रचारित प्रचलनों का आंख मूंदकर अनुकरण नहीं करना चाहिए। उनका चुनाव उनके प्रभावों की उचित समझ के बाद ही किया जान चाहिए। केवल अपरिहार्य परिस्थितियों में ही स्‍तनपान से वैकल्पिक आहार की ओर शिफ्ट करने जैसे अप्रत्‍याशित कदम उठाये जाने चाहिए। जब कोई और चारा न रह जाये अन्‍यथा स्‍तनपान ही सर्वोत्‍तम तरीका है।
            ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं है जिससे स्‍तनपान संबंधी सारी समस्‍याएं दूर हो जाएं। इसलिए, अब हम अपनी पूरी शक्ति लगा कर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहां सभी महिलाएं अपने बच्‍चों को स्‍तनपान करायें और सभी बच्‍चों को पर्याप्‍त मात्रा में मां का दूध मिल सके।
स्‍तनपान के समय से शुरू करने से, विशेष तौर पर छह महीने तक बच्‍चों को स्‍तनपान कराने और उसके बाद दो वर्ष या उससे ज्‍यादा अवधि तक स्‍तनपान के साथ ही पूरक आहार देने से बच्‍चे अतिसार, पेचिस, निमोनिया जैसे कई रोगों और संक्रमण से भी बचाव हो जाता है। इसके साथ ही बच्‍चों की असामयिक मौत का भी खतरा कम हो जाता है।
*डा संतोष जैन पासी, पूर्व निदेशक, इंस्‍टीचयूट आफ होम इकोनोमिक्‍स, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय
** डा. वंदना सभरवाल, असिस्‍टेंट प्रोफेसर, इंस्‍टीच्‍यूट आफ होम इकोनोमिक्‍स, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय
*** सुश्री अकांक्षा जैन, अनुसंधान सहायक, पीएचएन, एल एस टेक वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड, गुड़गांव
पीआईबी फीचर्स

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