| साभार पत्र सूचना कार्यालय भारत सरकार स्तनपान : स्वास्थ्यवर्द्धक और जीवनरक्षक पहल |
लेख
स्तनपान सप्ताह – 1 से 7 अगस्त, 2014
डॉ. संतोष जैन पासी*
डॉ. वंदना सभरवाल**
सुश्री आकांक्षा जैन***
प्रत्येक बच्चे को जीवन के शुरूआती वर्षों में उचित शारीरिक वृद्धि और विकास के लिए पर्याप्त पोषण, उचित देखभाल, प्यार और स्नेह की जरूरत होती है। स्तनपान न केवल शिशुकाल/बचपन के दौरान बल्कि बाद के वर्षों में भी उसके स्वस्थ जीवन की नींव रखता है। 6 मास का होने तक बच्चे को केवल मां का दूध पिलाए जाने की जरूरत है, इसके अलावा उसे कुछ और नहीं पिलाया जाना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार केवल टॉनिक या पूरक दवाइयां दी जा सकती हैं।
जीवन के पहले 6 महीनों में मां का दूध शिशु को वे सभी पोषण तत्व उपलब्ध कराता है, जो उसके अधिकतम विकास और वृद्धि के लिए जरूरी होते हैं। इसलिए शिशु को पहले 6 महीनों के दौरान केवल स्तनपान कराया जाना चाहिए, अर्थात बच्चा केवल मां के दूध पर ही निर्भर रहे, उसे अन्य कोई तरल पदार्थ यहां तक की पानी भी नहीं पिलाया जाना चाहिए। पोषण के अलावा स्तनपान का सबसे मूल्यवान योगदान यह है कि इससे मां और बच्चे के बीच स्थायी सकारात्मक संबंध विकसित होते हैं, जिससे शिशु का भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक विकास उसके मस्तिष्क वृद्धि पर सीधे ही प्रत्यक्ष प्रभाव डालने में सहायक होता है। स्तनपान शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास को तेजी से बढ़ाता है। 6 माह की आयु के बाद बच्चे को पर्याप्त तथा सुरक्षित पूरक खाद्य पदार्थ खिलाना आवश्यक हो जाता है, ताकि बच्चे की पोषक जरूरतों और स्तनपान के द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे पोषक तत्वों के मध्य अंतर को पूरा किया जा सके। इस प्रकार पहले 6 महीनों में स्तनपान समय पर शुरू करने और उसे केवल स्तनपान ही कराने के साथ-साथ 6 माह की उम्र के बाद पूरक पदार्थ खिलाने के साथ-साथ स्तनपान भी जारी रखना किसी बच्चे की उचित वृद्धि और विकास के प्रमुख आधार हैं। अगर बच्चे स्वस्थ हैं तो पूरा देश स्वस्थ है, जिससे देश की उत्पादकता और आर्थिक वृद्धि में सुधार होता है।
नवजात, शिशु और नन्हें-मुन्नों के लिए स्तनपान पोषण का एक प्राकृतिक और सस्ता तरीका है। कृत्रिम/टॉप पोषण की तुलना में स्तनपान कराना बहुत सस्ता है, जिससे घर के बजट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। स्तनपान मानसिक विकास बढ़ाने के साथ-साथ बच्चे की सीखने के कार्य में वृद्धि करता है और वैश्विक प्राथमिक शिक्षा को आसान बनाने में मदद करता है। इससे बच्चे को जीवन में एक अच्छी शुरूआत मिलती है और लिंग भेद समाप्त होता है। स्तनपान कराने से जीवन के पहले वर्ष में बच्चों की मृत्यु दर कम से कम 13 प्रतिशत कम हो जाती है।
इससे जीवन के पहले साल में शिशु मृत्यु दर की संभावनाएं तकरीबन 13 फीसदी घट जाती हैं। इससे अगली बार गर्भधारण का खतरा भी घट जाता है और इस तरह इससे दो बार गर्भधारण के बीच के अंतराल को बढ़ाने में मदद मिलती है। अगर किसी शिशु को उसके जीवन के प्रथम छह माह के दौरान केवल स्तनपान कराया जाए तो संक्रमित मां से बच्चे को एचआईवी का प्रसार होने के आसार कम हो जाते हैं। स्तनपान से औषधि, प्लास्टिक और अल्यूमीनियम कचरे का उत्पादन घटाने में मदद मिलती है और इससे पर्यावरण में निरंतरता सुनिश्चित होती है। यही नहीं, इससे सामुदायिक भागीदारी को भी बढ़ावा मिलता है क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों, विशेषज्ञता और अनुभव वाले लोग एक साझा लक्ष्य पाने के लिए काम करते हैं।
विश्व भर में हर साल जन्म लेने वाले 13.5 करोड़ बच्चों में से 60 फीसदी को पर्याप्त स्तनपान सुलभ नहीं हो पाता है। अपर्याप्त स्तनपान के चलते जो कीमत चुकानी पड़ती है वह बेहद ज्यादा होती है। अपर्याप्त स्तनपान अर्थशास्त्र के अलावा शिशु/बाल मृत्यु दर, संक्रमण और समुदाय की मानसिक व सामाजिक सोच को प्रभावित करने वाली बीमारियों के जोखिम से भी जुड़ा हुआ है।
वहीं, दूसरी ओर जिन शिशुओं को उनके जीवन के प्रथम छह माह के दौरान अच्छा-खासा स्तनपान नसीब होता है, उन्हें उन बच्चों के मुकाबले मधुमेह, हाइपरटेंशन जैसी गैर-संक्रमणीय बीमारियां होने का खतरा काफी कम रहता है जिन्हें या तो बिल्कुल भी नहीं अथवा अपर्याप्त स्तनपान सुलभ होता है। पर्याप्त स्तनपान का लाभ बच्चों को बड़े होने के बाद भी यानी प्रौढ़ावस्था/वृद्धावस्था के दौरान भी मिलता है।
यह वाकई संयोग ही है कि स्तनपान और पूरक पोषण उन सभी आठ मिलेनियम डेवलपमेंट गोल (एमडीजी) से जुड़े हुए हैं जो तकरीबन दो दशक पहले (1990) विभिन्न सरकारों और संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2015 तक गरीबी से लड़ने और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए तय किए गए थे। अत: स्तनपान को संरक्षण, बढ़ावा और समर्थन देकर हममें से सभी अपने बच्चों की अच्छी सेहत सुनिश्चित कर एमडीजी को पाने और इस तरह अपने राष्ट्र के समग्र विकास में काफी हद तक योगदान दे सकते हैं।
हालांकि समुचित स्तनपान और पूरक पोषण के ज्ञान को व्यवहार में तभी लाया जा सकता है जब माताओं, उनके पतियों, अन्य पारिवारिक सदस्यों, खासकर सास और इस तरह से पूरे समुदाय की सोच में वास्तविक बदलाव आयेगा। पर्याप्त स्तनपान और पूरक पोषण की सोच को विकसित करने के लिए माताओं के भरोसे को सही अर्थों में बढ़ाना होगा ताकि वे अपने बच्चों को सफलतापूर्वक स्तनपान करा सकें। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि पिता/अन्य पारिवारिक सदस्यों की ओर से समुचित समर्थन सुनिश्चित कर, कामकाज की स्थितियां बेहतर कर और घरेलू जिम्मेदारियां कम करके माताओं के लिए सही माहौल बनाया जाए। इससे अपने बच्चों की सेवा में जुटी माताएं स्तनपान के लिए पर्याप्त समय दे सकेंगी। अगर कोई मां अपर्याप्त स्तनपान की समस्या से जूझ रही है अथवा उसे बच्चे को स्तनपान कराने में दिक्कत आती है तो उसे डॉक्टर अथवा स्तनपान कराने वाली अन्य महिलाओं से सलाह-मशविरा करना चाहिए ताकि उसे इस काम में विफलता हाथ न लगे और यह प्रक्रिया सतत जारी रहे। जहां तक कामकाजी माताओं का सवाल है, उन्हें पर्याप्त मातृत्व लाभ देने और उनके लिए विस्तृत छुट्टियां (जहां आवश्यक हो) सुनिश्चित करने की जरूरत है। इस संदर्भ में शिशु की देखभाल के लिए अवकाश देने की सरकारी पहल वाकई उत्कृष्ट कदम है। हालांकि लाभार्थियों को इस सुविधा का इस्तेमाल काफी सोच-समझ कर करना चाहिए।
उन माताओं में जो शिक्षित हैं, घर से बाहर काम करती हैं और उच्च/बेहद उच्च धनी वर्गों से ताल्लुक रखती हैं, स्तनपान बंद करने या जरूरत से कम स्तनपान कराने की संभावन ज्यादा रहती है। बहरहाल, समृद्ध भद्र वर्ग से जुड़ी दूसरी समस्यायें हैं। ज्यादातर माताएं जानबूझकर 6 महीने से पहले स्तनपान बंद कर देती हैं क्योंकि वे महसूस करती हैं कि लम्बे समय तक स्तनपान कराने से उनकी अपनी सेहत पर प्रभाव प़ड सकता है क्योंकि उन्हें अपने शिशु से जुड़ा रहना पडेगा। अपर्याप्त स्तनपान की वजह से समय से पहले ही पूरक दूध/स्तनपान विकल्प लागू कर देना पडता है जिससे मां की भूमिका और नवजात शिशु देखभाल पद्धति में परिवर्तन आ जाता है। वास्तव में, यह सब आज तेजी से बदलती आधुनिक जिंदगी की जटिलताओं की वजह से होता है बजाए अपर्याप्त स्तन दुग्ध उत्पादन के। दुनियाभर में अनुसंधानकर्ताओं ने यह साबित किया है कि ज्यादातर माताएं अपने शिशुओं को पर्याप्त दूध पिलाने में सक्षम हैं और यह भावना कि उनका दूध पर्याप्त नहीं है अकसर अन्य कारणों से आती हैं जिसमें एक स्तन से आंशिक दुग्धपान, स्तन पर शिशु की गलत अवस्था, स्तनाग्र की सूखी अवस्था, स्तनपान कराने वाली दो कडि़यों के बीच लम्बा अंतर आदि शामिल हैं। इसके अलावा माता-पिता/माताएं व्यवसायी रूप से उत्पादित शिशु दूध/नवजात आहारों के लुभावने विज्ञापनों के बहकावे में आ जाती हैं और स्तन, दुग्ध विकल्पों पर उनकी निर्भरता स्तनपान की लागत को बढ़ा देती हैं। इन व्यावसायिक नवजात फॉर्मूले के लिए वरीयता कई बार चिकित्सकों की अनुशंसाओं से भी प्रभावित होती हैं क्योंकि उनमें से कई चिकित्सक लगातार इन आहारों की अनुशंसा करते हैं और दावा करते हैं कि व्यावसायिक नवजात दुग्ध/आहार उनके शिशु को बेहतर पोषण मुहैया कराने में सहायक होगा। इसके अतिरिक्त, बदलती जीवन शैली और कामकाजी महिलाओं की बढ़ती संख्या, जो अपने पेशे में सफल होना चाहती हैं, खुद ही सुविधाजनक शिशु आहार विकल्प के लिए व्यावसायिक नवजात दुग्ध/आहारों को बढ़ावा देती हैं। शिक्षित, भद्र महिलाओं के लिए ध्यान रखने की एक बात है। याद रखिए.....अधिकतम स्तनपान और पूरक आहार अपनाना आपके शिशुओं की पौष्टिकता, सेहत, शारीरिक तथा मानसिक वृद्धि, भावनात्मक और सामाजिक विकास के लिए आपका एक निवेश है और इस प्रकार जीवनभर के लिए उसके व्यक्तित्व के समग्र विकास के लिए जरूरी है।
माताओं को अधिकतम नवजात आहार प्रचलन को बनाये रखने के प्रति काफी जागरूक रहने की जरूरत है। स्तन, दुग्ध की अपर्याप्तता कामकाज के व्यस्त कार्यक्रमों जैसे रोजाना की छोटी समस्याओं को अभिनव रणनीतियों के जरिये दूर करने की जरूरत है जिसका क्रियान्वयन जरूरत के हिसाब से किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त पिता और परिवार के अन्य सदस्यों का पर्याप्त सहयोग भी बहुत महत्वपूर्ण है। माता की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक बेहतरी तथा माता तथा शिशु के बीच बेहतर मेलजोल का माता के दूध पिलाने के प्रदर्शन पर काफी सकारात्मक प्रभाव पडता है। इसलिए, यह आवश्यक है कि माता को सही प्रकार का वातावरण, खासकर तनाव मुक्त माहौल मुहैया कराया जाये जिससे कि वह सफलतापूर्वक बच्चे को स्तनपान करा सके। व्यावसायिक रूप से प्रचारित प्रचलनों का आंख मूंदकर अनुकरण नहीं करना चाहिए। उनका चुनाव उनके प्रभावों की उचित समझ के बाद ही किया जान चाहिए। केवल अपरिहार्य परिस्थितियों में ही स्तनपान से वैकल्पिक आहार की ओर शिफ्ट करने जैसे अप्रत्याशित कदम उठाये जाने चाहिए। जब कोई और चारा न रह जाये अन्यथा स्तनपान ही सर्वोत्तम तरीका है।
ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं है जिससे स्तनपान संबंधी सारी समस्याएं दूर हो जाएं। इसलिए, अब हम अपनी पूरी शक्ति लगा कर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहां सभी महिलाएं अपने बच्चों को स्तनपान करायें और सभी बच्चों को पर्याप्त मात्रा में मां का दूध मिल सके।
स्तनपान के समय से शुरू करने से, विशेष तौर पर छह महीने तक बच्चों को स्तनपान कराने और उसके बाद दो वर्ष या उससे ज्यादा अवधि तक स्तनपान के साथ ही पूरक आहार देने से बच्चे अतिसार, पेचिस, निमोनिया जैसे कई रोगों और संक्रमण से भी बचाव हो जाता है। इसके साथ ही बच्चों की असामयिक मौत का भी खतरा कम हो जाता है।
*डा संतोष जैन पासी, पूर्व निदेशक, इंस्टीचयूट आफ होम इकोनोमिक्स, दिल्ली विश्वविद्यालय
** डा. वंदना सभरवाल, असिस्टेंट प्रोफेसर, इंस्टीच्यूट आफ होम इकोनोमिक्स, दिल्ली विश्वविद्यालय
*** सुश्री अकांक्षा जैन, अनुसंधान सहायक, पीएचएन, एल एस टेक वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड, गुड़गांव
पीआईबी फीचर्स
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रविवार, 24 अगस्त 2014
स्तनपान : स्वास्थ्यवर्द्धक और जीवनरक्षक पहल
सोमवार, 9 दिसंबर 2013
Food inspector syllabus :
Food inspector syllabus : uttar pradesh
Food inspector exam consists of two papers ;
Paper I
Paper II
1) First Paper – General Studies :
The paper of General Studies will include question on the following topics :
1. General Science
2. Current Events of National nad International Importance.
3. History of India.
4. Indian National Movement.
5. Indian Polity and Economy.
6. World Geography and Population.
Question on General Science will cover general appreciation and understanding of Science, including matters of everyday observation and experience, as may be expected of a well educated person who has not made a special study of any scientific discipline.
In History of India emphasis should be on broad understanding of
economic, Social, Cultural and Political aspects of Indian History. In Indian National Movement, the candidates are expected to have a synoptic view of the nature and character of the Indian freedom movement, growth of nationalism and attainment of independence. In Indian Polity and Economy questions will test knowledge of the candidate pertaining to Indian Polity including the Indian Constitution, Panchayati Raj and community Development,
broad features of Indian economy and planning. In world Geography and population, only General understanding of the subject will be expected with emphasis on physical/ecological, economic and socio-demographic aspects of Geography of India. Candidates are expected to have general awareness about the above topics with special reference to Uttar Pradesh.
2) Second Paper – Main Subject:
1. Definition and standards of Food quality. Proximate analysis of Foods, Fat, Protein, Carbohydrate, Vitamins, Minerals Fibres and Water, Human Nutrition, Major and Minor Nutrients and their role, Deficiency Diseases.
2. Fruits, Vegetables and Plantation products:- Definition, Classification, Juices, Pulps, Powder & Extracts, Squash, Cordials, RTS_Beverages etc., Jam, Jellies & Marmalades, Puree, Paste and Concentrates. Ketchups, Sauce & Pickles, Still & Carbonated Beverages. Tea, Coffee and Chocolates, Spices, Quality tests of above food products.
3. Cereals, Pulses and Oil-Seed products:- Definition and Classification of wheat, Rice, Pulses & Oil seed products. Flour, Bread, Biscuits, Cake and other Baked Items. Dehulled legume-Pulses. Vegetable Oil- Refined & Hydrogenerated etc.
4. Animal Food Products: Fluid Milk and its various kinds. Concentrated and dried milk Products, Fermented Milk Foods, Cream, Ice-Cream, Butter, Chees, Milk Adulterants and its detection. Meat, Fish, Poultry and Egg Products and their quality Control.
5. Food Additive, Chemical Preservation and assessment of excess use of preservatives & Chemicals, Food Colours, Poisonous metals, Anti Oxidants, Food Flavors, Insecticides & Pesticides, Irradiated Foods. Fierobiological quality of Foods, Food safety, Food Sanitation and Hygeine. PFA, FPO, BIS and AGMARK Specifications of various types of Food and Food Products.
Food inspector exam consists of two papers ;
Paper I
Paper II
1) First Paper – General Studies :
The paper of General Studies will include question on the following topics :
1. General Science
2. Current Events of National nad International Importance.
3. History of India.
4. Indian National Movement.
5. Indian Polity and Economy.
6. World Geography and Population.
Question on General Science will cover general appreciation and understanding of Science, including matters of everyday observation and experience, as may be expected of a well educated person who has not made a special study of any scientific discipline.
In History of India emphasis should be on broad understanding of
economic, Social, Cultural and Political aspects of Indian History. In Indian National Movement, the candidates are expected to have a synoptic view of the nature and character of the Indian freedom movement, growth of nationalism and attainment of independence. In Indian Polity and Economy questions will test knowledge of the candidate pertaining to Indian Polity including the Indian Constitution, Panchayati Raj and community Development,
broad features of Indian economy and planning. In world Geography and population, only General understanding of the subject will be expected with emphasis on physical/ecological, economic and socio-demographic aspects of Geography of India. Candidates are expected to have general awareness about the above topics with special reference to Uttar Pradesh.
2) Second Paper – Main Subject:
1. Definition and standards of Food quality. Proximate analysis of Foods, Fat, Protein, Carbohydrate, Vitamins, Minerals Fibres and Water, Human Nutrition, Major and Minor Nutrients and their role, Deficiency Diseases.
2. Fruits, Vegetables and Plantation products:- Definition, Classification, Juices, Pulps, Powder & Extracts, Squash, Cordials, RTS_Beverages etc., Jam, Jellies & Marmalades, Puree, Paste and Concentrates. Ketchups, Sauce & Pickles, Still & Carbonated Beverages. Tea, Coffee and Chocolates, Spices, Quality tests of above food products.
3. Cereals, Pulses and Oil-Seed products:- Definition and Classification of wheat, Rice, Pulses & Oil seed products. Flour, Bread, Biscuits, Cake and other Baked Items. Dehulled legume-Pulses. Vegetable Oil- Refined & Hydrogenerated etc.
4. Animal Food Products: Fluid Milk and its various kinds. Concentrated and dried milk Products, Fermented Milk Foods, Cream, Ice-Cream, Butter, Chees, Milk Adulterants and its detection. Meat, Fish, Poultry and Egg Products and their quality Control.
5. Food Additive, Chemical Preservation and assessment of excess use of preservatives & Chemicals, Food Colours, Poisonous metals, Anti Oxidants, Food Flavors, Insecticides & Pesticides, Irradiated Foods. Fierobiological quality of Foods, Food safety, Food Sanitation and Hygeine. PFA, FPO, BIS and AGMARK Specifications of various types of Food and Food Products.
शनिवार, 30 मार्च 2013
ias new notification 2013
पिरिशिष्ट -I
खंड- I
आई ए एस 2013 परीक्षा की योजना
इस प्रितियोगी परीक्षा मेंदो बिमक चरण हैं।(i) प्रधान परीक्षा के िलए उम्मीदवारों के चयन हेतुिसिवल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा (वस्तुपरक) तथा
(ii)विभन्न सेवाओं तथा पदों हेतु उम्मीदवारों का चयन करनेके िलएिसिवल सेवा (ूधान) परीक्षा लिखत तथा साक्षात्कार)
2.प्रारंभिक परीक्षा में वःतुपरक (बहुविकल्पीय प्रश्न ) प्रकार के दो प्रश्न पत्र होंगे तथा खंड-।। के उपखंड (क) में दिए गए विषयों में अिधकतम 400 अंक होंगे। यह परीक्षा केवल प्राक्चयन परीक्षण के रूप में होगी। प्रधान रीक्षा में ूवेश हेतु अहर्ता ूाप्त करने वाले उम्मीदवार द्वारा ूारंिभक परीक्षा में ूाप्त िकए गए अकों ं को उनके अितम ं योग्यताबम को िनधािरतर् करने के िलए नहीं िगना जाएगा । ूधान परीक्षा में ूवेश िदए जाने वाले उम्मीदवारों की सख्ं या उक्त वषर् में िविभन्न सेवाओं तथा पदों में भरी जाने वाली िरिक्तयों की कुल संख्या का लगभग बारह सेतेरह गुना होगी । केवल वे ही उम्मीदवार जो आयोग द्वारा इस वषर् की ूारंिभक परीक्षा मेंअहर्ता ूाप्त कर लेते हैंउक्त वषर् की ूधान परीक्षा में ूवेश के पाऽ होंगे बशतेर्िक वे अन्यथा ूधान परीक्षा में ूवेश हेतुपाऽ हों ।
िटप्पणी :- I आयोग, िसिवल सेवा (प्रधान) परीक्षा के िलए अहर्क उम्मीदवारों की एक सूची तैयार रेगा, िजसका िनधारणर् आयोग द्वारा दोनों प्रश्नपत्रों के यथािनधािरतर् कुल अहर्क अकों ं को जोड़कर िकया जाएगा ।
िटप्पणी :- II प्रश्नपत्रों में ऐसे कुछेक प्रश्नों को छोड़कर जिनमें ऋणात्मक अंकन (नेगेटिव मािकर्ंग) ऐसे ूँनों के िलए ‘सवािधकर् उपयक्ुत’ ‘इतना उपयुक्त नहीं’ उत्तर को िदए जाने वाले िविभन्न अकों ं के रूप में अन्तिनिहतर् होगी, उम्मीदवार द्वारा िदए गए गलत उत्तरों के िलए दंड (ऋणातमक् अकनं ) िदया जाएगा ।
(i) ूत्येक ूँन के उत्तर के िलए चार िवकल्प हैं। उम्मीदवार द्वारा ूत्येक ूँन के िलए िदए गए गलत उत्तर के िलए, उस ूँन के िलए िदए जाने वाले अकों ं का एक ितहाई (0.33) दण्ड के रूप मेंकाटा जाएगा ।
(ii) यिद उम्मीदवार एक सेअिधक उत्तर देता है तो उसे गलत उत्तर माना जाएगा चाहे िदए गए उत्तरों में से एक ठीक ही क्यों न हो और उस ूँन के िलए वही दण्ड होगा जो ऊपर बताया
(iii) यिद ूँन को खाली छोड़ िदया गया है अथातर् ्उम्मीदवार द्वारा कोई उत्तर नहीं िदया गया हैतो उस ूँन के िलए कोई दण्ड नहीं होगा ।
3. ूधान परीक्षा में िलिखत परीक्षा तथा साक्षात्कार परीक्षण होगा । िलिखत परीक्षा में खंड ।। के उप खंड (ख) में िदए गए िवषयों के परम्परागत िनबधात् ं मक शैली के 9 ूँनपऽ होंगे िजसमें से 2 ूँनपऽ अहर्क ूकार के होंगे । खंड
।। (ख) के पैरा । के नीचेनोट (ii) भी देखें । सभी अिनवायर् ूँनपऽों (ूँनपऽ I से ूँनपऽ VII तक ूाप्त अंकों) और व्यिक्तत्व परीक्षण के िलए साक्षात्कार में ूाप्त अंकों के आधार पर उनका योग्यता बम िनधािरतर् िकया जाएगा ।
4. जो उम्मीदवार ूधान परीक्षा के िलिखत भाग में आयोग के िववेकानुसार यथािनधािरतर् न्यूनतम अहर्क अंक ूाप्त करते हैंउन्हें खंड ।। के उप खंड ‘ग’ के अनुसार व्यिक्तत्व परीक्षण के िलए साक्षात्कार हेतुबुलाया जाएगा । साक्षात्कार के िलए बुलाए जाने वाले उम्मीदवारों की संख्या भरी जाने वाली िरिक्तयों की संख्या से लगभग दगनी होगी । साक्षात्कार के िलए 275 अकं (कोई न्यूनतम अहर्क अंक नहीं) होंगे । इस ूकार उम्मीदवारों द्वारा ूधान परीक्षा (िलिखत भाग तथा साक्षात्कार) में ूाप्त िकए गए अंकों के आधार पर अितम ं तौर पर उनके रैंक का िनधारणर् िकया जाएगा । उम्मीदवारों को िविभन्न सेवाओं का आबंटन परीक्षा में उनके रैंकों तथा िविभन्न सेवाओं और पदों के िलए उनके द्वारा िदए गए वरीयताबम को ध्यान में रखते हु ए िकया जाएगा ।
खंड-।।
प्रारंभिक तथा प्रधान परीक्षा की रूपरेखा तथा िवषय :
प्रारंभिक परीक्षा :
इस परीक्षा में दो अिनवायर् ूँनपऽ होंगे जिसमें प्रत्येक प्र 200 अकों का होगा ।नोट :
(i) दोनों ही ूँनपऽ वःतुिनंठ (बहुिवकल्पीय) ूकार के होंगे ।
(ii) ूँनपऽ िहन्दी और अमं ेजी दोनों ही भाषाओं मेंतैयार िकए जाएगं ेतथािप, दसवीं कक्षा ःतर के अमं ेजी भाषा के बोधगम्यता कौशल सेसंबंधी ूँनों का परीक्षण, ूँनपऽ मेंकेवल अमं ेजी भाषा के उद्वरणों के माध्यम सेिहन्दी अनवाद ु उपलब्ध कराए िबना िकया जाएगा ।
(iii) पाठ्यबम संबंधी िववरण खंड-।।। के भाग-क मेंिदया गया है।
(iv) ूत्येक ूँनपऽ दो घटं े की अविध का होगा । तथािप, नेऽहीन उम्मीदवारों को ूत्येक ूँनपऽ के िलए 20 िमनट का अितिरक्त समय िदया जाएगा ।
प्रधान परीक्षा :‐
िलिखत परीक्षा में िनम् निलिखत ूँन पऽ होंगे:‐अहर्क ूँनपऽ :
ूँन पऽÑक
(सिवधान ं की आठवीं अनसु ूची में सिम्मिलत
भाषाओं में से उम्मीदवारों द्वारा चनी ु गई कोई
एक भारतीय भाषा ।) 300 अकं
ूँन पऽ-ख.
अमं ेजी 300 अकं
वरीयता बम के िलए िजन ूँन पऽों को
आधार बनाया जाएगा ।
ूँन पऽ-I
िनबंध 250 अंक
ूँन -पऽ-II
सामान् य अध्ययन -I 250 अंक
(भारतीय िवरासत और संःकृित, िवँव का
इितहास एवं भगोल ू और समाज)
ूँन - पऽ-III
सामान् य अध्ययन -II 250 अंक
(शासन व्यवसथा ् , संिवधान, शासन- ूणाली,
सामािजक न्याय तथा अंतरांर्शीय संबंध)
बुधवार, 22 जून 2011
गंगा-यमुना एक्सप्रेसवे विरोधी अभियान
कार्यकर्ता शिविर, 19-20 जून, 2011, स्थान- ओंग फतेहपुर (उ.प्र.)
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लुभावनी विकास योजनाओं के मकड़जाल में फँसी राज्य सरकारों की योजनाओं में उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा गंगा व यमुना एक्सप्रेसवे का निर्माण प्रस्तावित है जिनमें लाखों किसानों की अत्यन्त उपजाऊ जमीन कौड़ियों के भाव खरीदकर बड़ी कम्पनियों को दी जा रही है। ये कम्पनियां आठ गलियारे की सड़क बनाकर बड़ी-बड़ी कम्पनियों के लिए परिवहन की व्यवस्था करेंगी, उनके किनारे शॉपिंग मॉल, रिहायशी कॉलोनियाँ और ऐशोआराम के अड्डे बनायेंगे। इससे दोआब की उपजाऊ खेती का विनाश होगा, देश की दो महान नदियाँ नष्ट होंगी और इन नदियों की किनारे की संस्कृति पर भी हमला होगा।
इन योजनाओं से उत्तर प्रदेश के कई जिलों के किसान आन्दोलित हैं। यमुना एक्सप्रेसवे के विरुद्ध किसानों का संघर्ष चल रहा है। गंगा एक्सप्रेसवे के खिलाफ बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, मिर्जापुर, इलाहाबाद, कानपुर में विरोध प्रदर्शन हुए हैं।
इन संघर्षों से जुड़े कुछ साथियों का यह विचार बना है कि जमुना और गंगा से जुड़े दोनों अभियानों के साथी कहीं दो दिन के लिए एक साथ बैठ लें, अपने-अपने अनुभव एक दूसरे से साझा कर लें और संभव हो तो दो अभियानों को जोड़ते हुए एक बड़ा आन्दोलना खड़ा करने पर विचार करें। वे ऐसा महसूस कर रहे हैं कि आन्दोलन की बड़ी ताकत बनने से ही ये परियोजनाएँ रोगी जा सकेंगी और खेती-किसानी, नदियों और संस्कष्ति को बचाया जा सकेगा।
आन्दोलन के साथियों ने दो दिन- 19-20 जून, रविवार-सोमवार को इसी उद्देश्य से आदर्श जनता इण्टर कॉलेज, ओंग, फतेहपुर (उ.प्र.) में एक शिविर रखा है जिसमें पूर्व, मध्य और पश्चिम उत्तर प्रदेश के इन मुद्दों पर संघर्षशील साथी आपस में मिल बैठकर आगे गी रणनीति बनायेंगे।
आज़ादी बचाओ आन्दोलन की वैकल्पिक ऊर्जा पर काम करने वालों से अपील
वैकल्पिक ऊर्जा पर काम करने वालों से अपील
अब इसमें कोई दो राय नहीं कि परमाणु ऊर्जा विनाषकारी है। जीवाष्म ईंधनों से मिलने वाली ऊर्जा भी अधिक दिनों तक नहीं मिल सकेगी, क्योंकि जीवाष्म ईंधनों के सीमित भंडार हैं। इसलिये ये भंडार निकट भविष्य में खत्म हो जायेंगे।
समय की मांग है कि ऊर्जा के ऐसे वैकल्पिक संसाधनों का इस्तेमाल किया जाय, जो अक्षय हैं अथवा जिनका नवीनीकरण संभव है। प्राकष्तिक ऊर्जा प्राप्त करने के अनेक स्रोत हो सकते हैं जैसे सूरज, पवन, समुद्र, बायोमास आदि। सौभाग्य से हमारे देश में प्राकष्तिक ऊर्जा के इन अक्षय या नवीनीकरणीय के स्रोतों की कहीं कमी नहीं है।
देश में जगह-जगह वैकल्पिक ऊर्जा के प्रयोग चल रहे हैं। इन प्रयोगों में सामाजिक सरोकार रखने वाले वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीविद लगे हुए हैं। जन संगठन भी इसमे योगदान कर रहे हैं। चिन्ता की बात है कि बड़े कॉरपोरेट समूह भी प्राकष्तिक ऊर्जा के क्षेत्र में कदम रख चुके हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि प्राकष्तिक ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने वाले वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकीविद, जन संगठन और समाजकर्मी एकजुट हों तभी परमाणु ऊर्जा और जीवाश्म ईंधनों का कारगर, भरोसेमंद और टिकाऊ विकल्प खड़ा कर सकेगा।
कॉरपोरेट प्रभावों से मुक्त जो लोग भी प्राकष्तिक ऊर्जा के विकास में लगे हुए हैं, उनको आजादी बचाओं आंदोलन आमंत्रित करता है कि वे अपने प्रयोगों के बारे में उसे लिख भेजें। समाजकर्मियों एवं जन संगठनों का आवाहन किया गया है कि अगर उनकी जानकारी में कहीं कोई ऐसा प्रयोग या अभियान चल रहा हो, तो उसके बारे में आजादी बचाओं आंदोलन को जानकारी दें ताकि आंदोलन उनसे सीधे संपर्क कर सके। आजादी बचाओं आंदोलन का संपर्क सूत्र है - ’स्वराज विद्यापीठ’ परिसर, 21-बी, मोतीलाल नेहरू रोड, इलाहाबाद - 211002, उ0प्र0। आंदोलन का ई-मेल है- azadi.bachao.andolan@gmail.com तथा फोन नं0 है - 09235406243.
अब इसमें कोई दो राय नहीं कि परमाणु ऊर्जा विनाषकारी है। जीवाष्म ईंधनों से मिलने वाली ऊर्जा भी अधिक दिनों तक नहीं मिल सकेगी, क्योंकि जीवाष्म ईंधनों के सीमित भंडार हैं। इसलिये ये भंडार निकट भविष्य में खत्म हो जायेंगे।
समय की मांग है कि ऊर्जा के ऐसे वैकल्पिक संसाधनों का इस्तेमाल किया जाय, जो अक्षय हैं अथवा जिनका नवीनीकरण संभव है। प्राकष्तिक ऊर्जा प्राप्त करने के अनेक स्रोत हो सकते हैं जैसे सूरज, पवन, समुद्र, बायोमास आदि। सौभाग्य से हमारे देश में प्राकष्तिक ऊर्जा के इन अक्षय या नवीनीकरणीय के स्रोतों की कहीं कमी नहीं है।
देश में जगह-जगह वैकल्पिक ऊर्जा के प्रयोग चल रहे हैं। इन प्रयोगों में सामाजिक सरोकार रखने वाले वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीविद लगे हुए हैं। जन संगठन भी इसमे योगदान कर रहे हैं। चिन्ता की बात है कि बड़े कॉरपोरेट समूह भी प्राकष्तिक ऊर्जा के क्षेत्र में कदम रख चुके हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि प्राकष्तिक ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने वाले वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकीविद, जन संगठन और समाजकर्मी एकजुट हों तभी परमाणु ऊर्जा और जीवाश्म ईंधनों का कारगर, भरोसेमंद और टिकाऊ विकल्प खड़ा कर सकेगा।
कॉरपोरेट प्रभावों से मुक्त जो लोग भी प्राकष्तिक ऊर्जा के विकास में लगे हुए हैं, उनको आजादी बचाओं आंदोलन आमंत्रित करता है कि वे अपने प्रयोगों के बारे में उसे लिख भेजें। समाजकर्मियों एवं जन संगठनों का आवाहन किया गया है कि अगर उनकी जानकारी में कहीं कोई ऐसा प्रयोग या अभियान चल रहा हो, तो उसके बारे में आजादी बचाओं आंदोलन को जानकारी दें ताकि आंदोलन उनसे सीधे संपर्क कर सके। आजादी बचाओं आंदोलन का संपर्क सूत्र है - ’स्वराज विद्यापीठ’ परिसर, 21-बी, मोतीलाल नेहरू रोड, इलाहाबाद - 211002, उ0प्र0। आंदोलन का ई-मेल है- azadi.bachao.andolan@gmail.com तथा फोन नं0 है - 09235406243.
आजादी बचाओ आन्दोलन
लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन के कई लड़ाकू सिपाहियों, कुछ बुद्धिजीवियों और छात्र-युवाओं के साथ 5 जून 1989 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गांधी भवन में सम्पूर्ण क्रान्ति दिवस मानने जुटे तो चर्चा में से यह विचार निकला कि देश की दुर्दशा में कहीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का योगदान तो नहीं है। इस विचार को ’लोक स्वराज अभियान’ नामक संगठन बनाकर इलाहाबाद में इस पर शोधकार्य शुरू किया गया। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के सामानों की सूची बनाना शुरू किया गया और विश्वविद्यालय के छात्रावासों, कालेजों में इन कम्पनियों के सामानों, खासतौर से कोकाकोला, पेप्सीकोला के बहिष्कार का अभियान शुरू हो गया। दो वर्ष में बहुराष्ट्रीय गुलामी का विचार अनेक गांधीवादी, समाजवादी विचारकों एवं समाजकर्मियों में वैज्ञानिकों, पत्रकारों, छात्रों अध्यापकों के बीच फैला और 8-9 जनवरी 1991 को महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम में पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ जिसमें बहुराष्ट्रीय गुलामी के विरुद्ध मुक्ति संग्राम का नाम आजादी बचाओ आन्दोलन रखा गया।
पहले 10-11 साल में आन्दोलन के साथियों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के सामानों का बहिष्कार कराने के साथ-साथ इस विचार को जन-जन के और जन संगठनों के बीच पहुँचाने का अथक प्रयास किया कि बहुराष्ट्रीय कारपोरेशन विकास के लिए नहीं आते। इनका यह महिमा मण्डन कि ये अपने साथ पूंजी और टैक्नोलाजी लाते हैं, गुणवत्तापूर्ण सस्ता सामान उपभोक्ता को उपलब्ध कराते हैं, यह भ्रामक है, गलत है और देश को फिर से लूटने की सोची-समझी साजिश है। ये कम्पनियाँ कैसी-कैसी छल-फरेबी करती हैं - अंडरइनवायससिंग और ओवरवायसिंग से कैसे अकूत धन देश के बाहर ले जाती हैं, सरकारों से तरह-तरह की सुविधाएँ और सबसिडियाँ लेती हैं और अपने उत्पादन के खर्च के एक बड़े हिस्से का बाह्यकरण ;म्गजमतदंसपेंजपवदद्ध कहती हैं यानी उसकी भरपाई व्यापक समाज को करनी पड़ती है। उदाहरण के लिए कोका कोला और पेप्सी के ठण्डेपेयों में 90 फीसदी पानी होता है जो लगभग वे मुफ्त लेती हैं, साथ ही उनके प्लांटों के कारण आसपास के जलस्रोत सूखते हैं, पानी प्रदूषित होता है और कष्षि की जमीन कैडमियम जैसी धातुओं के फैलने के कारण जहरीली हो जाती है। यह सारा खर्च प्लांट के आसपास के किसान और लोग उठाते हैैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के काले कारनामों को आन्दोलन ने खोजकर अमा जन के सामने रखा और उनकी प्रचारित महिमा का खण्डन किया। इनमें कोला कम्पनियाँ, कारगिल, यूनियन कारबाइड, एनरान आदि को विशेष रूप से लक्ष्य बनाया गया।
इस अभियान के लिए कई भाषाओं में करोंड़ों पर्चे छपाकर बाँटे गये, बुलैटिन ’साथियों की चिट्ठी’ और मासिक ’नई आजादी उद्घोष’ हिन्दी व अंग्रेजी में प्रकाशित की गयीं, छोटी-छोटी पुस्तिकाएँ, कैसेट और पोस्ट तैयार किये गये। साथियों ने जगह-जगह गोष्ठियाँ, सभाएँ, नुक्कड़ नाटक आदि करके विचार को फैलाया। स्कूल-कालेजों के छात्र-छात्राओं पर विशेष ध्यान दिया गया। दो बार उनकी मानव श्रंष्खलाएँ बनायी गयीं, एक बार उत्तर प्रदेश में 300 किलोमीटर लम्बी और दूसरी बार हरियाणा, पंजाब, चण्डीगढ़, पश्चिम उत्तर प्रदेश, राजस्थान में 1200 किलोमीटर लम्बी जिनमें क्रमशः 4 लाख और 10 लाख लोग खड़े हुए।
आन्दोलन के इस पहले दौर में एक महत्वपूर्ण कार्य हुआ। आन्दोलन शुरू होने के दूसरे साल भारत सरकार ने नयी आर्थिक नीति की घोषणा की जो दरअसल विश्व बैंक, मुद्राकोष द्वारा नियोजित भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियाँ थीं। साथ ही गैट के आठवें चक्र में विश्व व्यापार संगठन का गठन हो रहा था। इन सबका उद्देश्य भारत के बाजारों को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए खोलना था। आन्दोलन ने जिनेवा से विश्व व्यापार संगठन के लिए तैयार किये गये डंकल ड्राफ्ट की एक प्रति मंगवाकर उसको प्रचारित किया। डंकल ड्राफ्ट को चुनौती देने वाली सबसे पहली जनहित याचिका आन्दोलन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दखिल की। डंकल ड्राफ्ट को सरकार न माने, इसके लिए 20 लाख हस्ताक्षर इकटठे किये गये। आन्दोलन ने इस बात को देश में फैलाया, खासतौर से जनसंगठनों में कि भूमण्डलीकरण पुनः उपनिवेशीकरण है। यह प्रसन्नता की बात है कि अब देश के सभी जन संगठन, जन आन्दोलन भूमण्डलीकरण के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं। 20-22 वर्ष पहले आन्दोलन ने जो चिन्ताएँ व्यक्त की थीं, वे आज दिखायी पड़ रही हैं। आज देश को उद्योगों, सेवा क्षेत्र, वित्त क्षेत्र, खेती, खुदरा व्यापार - सभी में देशी-विदेशी कारपोरेट घुस गये हैं और सरकारें उनके प्रवेश करने में मददगार बन रही हैं। जिस कारपोरेट कालोनियलिज्म की बात आन्दोलन लगातार करता आ रहा है आज वह देश में स्थापित हो गयी है।
आन्दोलन का दूसरा वर्तमान चरण: संसाधनों पर जनसमुदाय की मालिकी का दौर
आन्दोलन के साथी यह लगातार महसूस करते रहे हैं कि देश की विकट समस्याओं, गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, गैर बराबरी, भ्रष्टाचार, सामाजिक विघटन आदि को हल करने के लिये यह जरूरी है बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का शिंकजा काटा जाय। ये कम्पनियाँ ही ज्यादातर समस्याओं की जननी हैं। पर ऐसा भी नहीं है कि इन कम्पनियों को बाहर खदेड़ देने से हमारी समस्याएँ अपने आप हल हो जायेंगी। उनका वर्चस्व घटने से समस्याएँ हल करने की परिस्थितियाँ अनुकूल बनेगी। पर असली मुद्दा यह है कि जो देश अपार संसाधन हैं - जमीन, पानी, जंगल, खानें, जलसम्पदा, पर्वतीय सम्पदा, इनका मालिक कौन है ? इनका विनियोग कैसे हो, इसका निर्णय करने का अधिकार किसके हाथ में है ?
इस समय मान्यता यह है कि देश के संसाधनों की मालिक सरकारें हैं और वे उन्हें कम्पनियों को दे सकती हैं। आन्दोलन ने घोषणा की है कि यह मान्यता गलत है। देश के संसाधनों के मालिक जन समुदाय हैं, जन समाज है- ग्राम समाज, मुहल्ला समाज। औद्योगिक क्रान्ति के बाद उद्योगों का वर्चस्व बढ़ता गया, बड़े-बड़े उद्योग पनपते गये जिनकी मालकियत या तो निजी प्राइवेट रही है या सरकार (पब्लिक)। कष्षि पर आधारित छोटे उद्योगों को इन बड़े उद्योगों ने सीमान्त कर दिया है। पूंजी का केन्द्रीकरण और आबादी का शहरीकरण तेजी से बढ़ा है। इस कारपोरेटी व्यवस्था ने पूरी दुनिया में विशेष रूप से भारत में तीन दुष्परिणाम पैदा किये हैः गरीबी-बेरोजगारी - गैरबराबरी, सामाजिक विघटन और पर्यावरण का विनाश। आन्दोलन की मान्यता है कि इस आर्थिक-सामाजिक-पर्यावरणीय संकट से मुक्ति पाने के लिए वर्तमान उद्योग-केन्द्रित पूंजी-प्रधान कारपोेरेटी विकास मॉडल को बुनियादी तौर से बदलना होगा। उसके स्थान पर कष्षि-केन्द्रित श्रम-प्रधान लघु उद्योगों से पोषित जन सामुदायिक विकास मॉडल स्थापित करना होगा। इसका पहला कदम है-संसाधनों पर जन समुदाय की मालकियत की घोषणा।
जन समुदाय की यह मालकियत स्थापित कैसे हों ? इसकी शुरुआत हो रही है। जगह-जगह पर संसाधनों पर कम्पनियों/सरकारें द्वारा कब्जा करने के विरुद्ध चल रहे जन आन्दोलन के एक उदाहरण से इसे समझने की कोशिश करें। झारखंड के हजारी बाग जिले में छः साल पहले वहाँ के 205 गाँवों को जमीन 32 देशी-विदेशी कम्पनियों को कोयला खनन और ताप बिजली पैदा करने के लिए दे दी गयी। आन्दोलन ने गाँववासियों को समझाया कि मुआवजा लेकर खेती की जमीन छोड़ देने से वे बर्बाद हो जायेंगे। उनको एक एकड़ जमीन के नीचे आज के दाम पर 40 करोड़ रुपये का कोयला भरा है। केवल जमीन ही नही, उसके नीचे का कोयला भी किसानों का है, भले ही सरकार कहे (कोयला कानून) की 2 फुट नीचे तक जमीन किसान की, उसके जमीन सरकार की। किसानों को बात समझ में आयी और पिछले छः साल से उन्होंने एक भी कम्पनी को वहाँ काम शुरू नहीं करने दिया है। पर सरकार कोयले पर जन समुदाय की मालकियत माने कैसे ? ग्राम सभाएँ इनती दमदार नहीं, उनके पिछले कई सालों से चुनाव भी नहीं हुए। अतः ग्राम समाज अपना हक स्थापित कर सकें ऐसी स्थिति वहाँ अभी नहीं बनी। अतः एक कदम आगे बढ़ने के लिए मध्यमार्ग निकाला गया। कम्पनी कानून 1956 में एक संशोधन हुआ है 2002 में और बना है प्रौडयूसर कम्पनी कानून। इसके तहत गाँव के किसान अपनी कम्पनी बना सकते हैं जिसका ढाँचा कोआरेटिव सोसाइटी की तरह होता है, बराबर के शेयर, कोई बाहरी व्यक्ति शेयरधारक नही, कम्पनी के लाभांश का एक भाग गाँव के कल्याण के लिए खर्च होता है, ऐसे प्रावधान इस कम्पनी में हैं। हजारी बाग में कई गाँवों को मिलाकर प्रोड्यूसर कम्पनियाँ बनायी गयी, अब तक 5 कम्पनियाँ पंजीकृत हो चुकी हैं। अब स्थिति यह है कि लोग बड़ी बाहरी कम्पनियों को तो काम नहीं करने देते, अपनी कम्पनियों को आगे बढ़ा रहे हैं। वे सरकार से कोयला ब्लॉक ले रहे हैं जहाँ गाँव के लोग खनन का काम करेंगे। एक कम्पनी के शेयरधारकों ने 50 मैगावाट ताप बिजली घर बनाने के लिए 100 एकड़ जमीन दे दी है। कोयले के खनन और ताप बिजलीघर पर खड़ा करने की तैयारियाँ चल रही है।
प्रौड्यूसर कम्पनी बनाकर संसाधनों पर जन समुदाय की मालकियत कायम करने का यह शुरुआती प्रयास है। इस प्रयोग को आन्दोलन उत्तराखण्ड में पनबिजली बनाने में कर रहा है। मध्य प्रदेश में कोशिश हो रही है कि सीमेंट बनाने वाली बड़ी देशी-विदेशी कम्पनियों को रोका जाय और लोग प्रौड्यूसर कंपनियों द्वारा बायोमास से बिजली बनाने का काम लोग प्रौड्यूसर कम्पनियाँ बनाकर खुद सीमेंट बनायें। अन्य स्थानों पर प्रौड्यूसर कंपनियों द्वारा बायोमास से बिजली बनाने, दूध की डेयरी चलाने का प्रयास भी चल रहा है। पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा, ज्वारभाटा ऊर्जा, से बिजली बनाने का काम लोगों की प्रौड्यूसर कम्पनियों से कराने की भी योजना है। मूल विचार यह है कि गाँव-गाँव में लोगों के हाथ में बिजली आ जाय जिसकी मालकियत और उसके प्रबन्धन का अधिकार उनका हो। लोगों के हाथ में बिजली आ जाने पर कृषि-आधारित लघु उद्योगों का जाल गाँव-गाँव में फैलाया जायेगा जिससे गाँव की सम्पत्ति शहरों और विदेशों को जाने से रुके। लोगों का सशक्तीकरण असलियत में तभी होगा।
यह मार्ग आसान नहीं है। इस मार्ग को तैयार करता है संघर्ष। संघर्ष में तपे लोग ही नव निर्माण का काम कर सकेंगे। संघर्ष और निर्माण के माध्यम से देश अधूरी आजादी को पूरा कर सकेगा।
आन्दोलन की वर्तमान गतिविधियाँ:
(1) स्वराज विद्यापीठ के माध्यम से शिक्षण- प्रशिक्षण कार्य: कारपोरेटी गुलामी से देश को मुक्त कराने और नये समाज का निर्माण करने के लिए प्रशिक्षित लोग, विशेसतः नवयुवक और नवयुवतियाँ चाहिए। आज की आजादी की लड़ाई भाग भावनात्मक नहीं है, इसके लिए भावनात्मक तैयारी के साथ-साथ इस कारपोरेटी व्यवस्था की अच्छी समझ और विश्लेषण जरूरी है। स्वराज विद्यपीठ यही काम कर रहा है। देश भर के विद्वानों, समाजकर्मियों, फिल्मों द्वारा आजादी के नये सेनानी तैयार करने का कार्य हो रहा है। विद्यापीठ की विशेषता यह है कि इसके शिक्षक-प्रशिक्षक वेतन/मानदेय नहीं लेते और शिक्षार्थी/प्रशिक्षार्थी फीस नहीं देते।
(2) जन संसद की गतिविधियों में सहयोग करना: अन्य जन संगठनों के साथ आजादी बचाओ आन्दोलन ने एक प्रक्रिया शुरू की है जिसे जन संसद का नाम दिया गया है। इस प्रक्रिया में देश के प्रमुख जन आन्दोलन/जनसंगठन/जन अभियान और सामाजिक सरोकार वाले बुद्धिजीवी देश की मूल समस्याओं पर अपनी समझ बनाकर उनके समाधान की साफ रणनीति बताते हैं और संघर्ष के कार्यक्रम चलाते हैं। जनसंसद का राष्ट्रीय कार्यालय आन्दोलन कार्यालय ही है।
(3) न्यूक्लियर पावर प्लांटों को रोकना: आन्दोलन की मान्यता है कि बिजली उत्पादन के लिए देश में अनेक संसाधन उपलब्ध हैं जिनसे बिजली बनाना खतरनाक नहीं है। परन्तु न्यूक्लियर बिजली बहुत खतरनाक है। केन्द्र सरकार विदेशी कारपोरेटों के दबाव में न्यूक्लियर प्लांट लगानें में जुटी है। फुकुशिमा के हादसे के बाद कई देशों ने न्यूक्लियर प्लांट बिजली को तिलांजलि दे दी है या देने का निर्णय कर लिया है पर भारत सरकार खड़ी हुई है। आन्दोलन सीधे-सीधे तथा अन्य संगठनों को सहयोग करके इन प्लांटों के विरुद्ध आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी कर रहा है। हरियाणा में फतेहाबाद में प्रस्तावित प्लांट के विरुद्ध संघर्ष का संचालन कर रहा है। मई में पश्चिमी तट पर न्यूक्लियर विरोधी यात्रा तारापुर से जैतापुर आयोजित हुई। अगले दो-तीन महीनों में पूर्वीतट और मध्य भारत में ऐसी ही यात्राओं की तैयारी चल रही है।
(4) कोला प्लांटों के विरूद्ध अभियान: आन्दोलन का यह अभियान प्रमुख अभियान रहा है। इसके प्रयास से कई प्लांट बन्द कराये गये हैं। बीच में यह अभियान थोड़ा शिथिल हो गया था, अब फिर से राजस्थान के कालाडेरा और उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद, हाथरस के कोकाकोला प्लंाटों के विरुद्ध आन्दोलन तेज हो रहा है। कालाडेरा पर पूरी ताकत लगायी जा रही है।
(5) गंगा-यमुना एक्सप्रैस वे रोकने का अभियान: आन्दोलन की मान्यता है कि ये दोनों एक्सप्रैसवे दोआब की की कष्षि और संस्कष्ति नष्ट कर देंगे। जगह-जगह पर किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। जमुना एक्सप्रैसवे के विरोध गलत दिशा में जा रहे हैं, वहाँ भूमि बचाने का नहीं, अधिक मुआवजा पाने का मुद्दा खड़ा हो गया है। कहीं-कहीं किसान भूमि बचाने पर भी खड़े हुए हैं। गंगा एक्सप्रैसवे के खिलाफ पूर्वी उत्तर प्रदेश में आन्दोलन हुए हैं। आन्दोलन की कोशिश चल रही है कि ये स्थानीय आन्दोलन एक बड़ा आन्दोलन बनें और संघर्ष जमीन बेचने के लिए नहीं, जमीन बचाने के लिए हो। इसके लिए 19-20 जून को आदर्श जनता इण्टर कालेज, ओंग (फतेहपुर) में सभी साथियों की बैठक आगे की रणनीति बनाने के लिये हो रही है।
(6) विनाशकारी प्रकल्पों के विरुद्ध अभियान: विदर्भ में कोयला खनन और प्रस्तावित 85 ताप बिजलीघरों के खिलाफ संघर्ष में आन्दोलन भागीदारी कर रहा है। उसकी पहले से वहाँ से अडानी कम्पनी को भगाया गया। मध्य प्रदेश के कटनी जिले की बरही तहसील में महानदी के किनारे 7 ताप बिजली घर प्रस्तावित हैं। आन्दोलन उन्हें न लगने देने के संघर्ष में भागीदारी कर रहा है। ओडिशा में दक्षिण कोरियाई कम्पनी पोस्को के स्टील प्लांट के खिलाफ चल रहे किसानों के आन्दोलन को समर्थन दिया जा रहा है।
(7) शान्ति और न्याय अभियान: सरकार की नीतियों में ंिहंसा है, समाज के कुछ लोग उसका हिंसा से विरोध करते हैं। सरकार उस विरोध को कानून और व्यवस्था की समस्या मानकर उसका हिंसा से दमन करती है। विदर्भ, आन्ध्र प्रदेश, ओडिश्सा, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल में माओवाद के नाम पर ऐसी हिंसा होने वाली हिंसा का सरकार ऑपरेशन ग्रीनहंट जैसे अभियान चलाकर दमन कर रही है। गृहयुद्ध की सी परिस्थितियाँ बन रही हैं। आंदोलन ने इसमें पहल की है। जन संसद के संगठनों के साथ पिछले साल मई में छत्तीसगढ़ में एक शान्ति एवं न्याय यात्रा रायपुर से दंतेवाड़ा तक निकाली। ऐसी ही यात्राओं की तैयारी अन्य प्रस्तावित प्रदेशों में चल रही है।(पीएनएन)
अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के गणितज्ञ प्रो0 बनवारी लाल शर्मा, आजादी बचाओ अन्दोलन के राष्ट्रीय संयोजक हैं।
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