सोमवार, 25 जनवरी 2016

प्रमुख वंश और उनके संस्थापक

हर्यक वंश का संस्थापक - बिम्बिसार
नन्द वंश का संस्थापक - महापदम नन्द
मौर्य साम्राज्य के संस्थापक - चन्द्रगुप्त मौर्य
गुप्त वंश के संस्थापक - श्री गुप्त श्रीगुप्त
पाल वंश के संस्थापक - गोपाल
पल्लव वंश के संस्थापक - सिंहविष्णु
राष्ट्रकूट वंश के संस्थापक - दन्तिदुर्ग
चालुक्य ( वातापी) वंश के संस्थापक - पुलकेशिन प्रथम
चालुक्य ( कल्याणी) वंश के संस्थापक - तैलप-द्वितीय
चोल वंश के संस्थापक - विजयालय
सेन वंश के संस्थापक - सामन्तसेन
राजपूत वंश के संस्थापक - अग्निकुल सिद्धांत
गुर्जर प्रतिहार वंश के संस्थापक - हरिश्चंद्र
चौहान वंश के संस्थापक - वासुदेव
परमार वंश के संस्थापक - भोज
चंदेल वंश के संस्थापक - नन्नुक
गुलाम वंश के संस्थापक - कुतुबुद्दीन ऐबक
ख़िलजी वंश के संस्थापक - जलालुद्दीन फिरोज ख़िलजी
तुगलक वंश के संस्थापक - गयासुद्दीन तुगलक
सैयद वंश का संस्थापक - खिज्र खान
लोदी वंश का संस्थापक - बहलोल लोदी
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना - हरिहर एवं बुक्का
बहमनी साम्राज्य की स्थापना - हसन गंगू
मुगल वंश के संस्थापक - बाबर 

महत्व पूर्ण तथ्य

● भारत में कुल कितने उच्च न्यायालय हैं                                            — 24  
● भारत के किस उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या सबसे कम है    — सिक्किम उच्च न्यायालय 
● भारत के किस न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या सबसे अधिक है        — इलाहाबाद उच्च न्यायालय 
● भारत का सबसे बड़ा उच्च न्यायालय कौन-सा है                                —इलाहाबाद उच्च न्यायालय 
● पटना उच्च न्यायालय की स्थापना कब हुई                                       — 1916 ई. 
● मध्य प्रदेश का उच्च न्यायालय कहाँ स्थित है                                    — जबलपुर
● उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को हटाने या बढ़ाने का अधिकार किसको है— भारतीय संसद को
● उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति कौन करता है                        —राष्ट्रपति
● उच्च न्यायालय का न्यायाधीश कितनी आयु तक अपने पद पर रह सकता है — 65 वर्ष की आयु तक
● उच्च न्यायालय में प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश कौन थीं—श्रीमती लीला सेठ
● किसी न्यायाधीश को एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में भेजने का अधिकार किसको है— राष्ट्रपति को
● भारत का चलित न्यायालय किसका मानसंपुज है— डॉ. ए.पी.जे. कलाम आजाद
● किस उच्च न्यायालय में सबसे अधिक स्थाई/अस्थाई खंडपीठ है— गुवाहटी उच्च न्यायालय में
● केरल का उच्च न्यायालय कहाँ स्थित है— एर्नाकुलम
● उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उसके पद व गोपनीयता की शपथ कौन दिलाता है— राज्यपाल
● संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्देश परिवर्तित किया जा सकता है—अनुच्छेद-226
● ओड़िशा राज्य का उच्च न्यायालय कहाँ स्थित है— कटक
● किसी राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायधीशों के वेतन एवं भत्ते का संबंध किससे होता है— संबंधित राज्य की लोकलेखा निधि से
● केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली का उच्च न्यायालय कहाँ स्थित है— दिल्ली में
►►. वित्तीय संस्थाएं एवं स्थापना वर्ष ►►►
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►- पंजाब नेशनल बैंक                           - 1894 ई.
►-इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया               -1921 ई.
►-भारतीय रिजर्व बैंक                           -1 अप्रैल 1935 ई.
►-भारतीय औद्योगिक वित्त निगम(IFCI)  - 1948 ई.
►-भारतीय औद्योगिक ऋण व निवेश नि.(ICICI) - 1955 ई.
►-भारतीय स्टेट बैंक (SBI)                    -1 जुलाई 1955 ई.
►-भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI)-1990 ई.
►-भारतीय निर्यात-आयात बैंक(EXIM BANK)-1 जनवरी, 1982 ई.
►-राष्ट्रीय आवास बैंक                            -जुलाई, 1988 ई.
►-भारतीय जीवन बीमा निगम(LIC)        -सितंबर, 1956 ई.
►-क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक                            -2 अक्टूबर, 1975 ई.
►-गृह विकास वित्त निगम लि.(HDFC)     -1977 ई.
प्रधानमंत्री द्वारा शुरू योजनाओं की सूची :
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➨ प्रधानमंत्री जन-धन योजना           - 28 अगस्त 2014
➨ डिजिटल इंडिया                         - 21 अगस्त 201
➨ मेक इन इण्डिया                        - 25 सितम्बर 2014
➨ स्वच्छ भारत मिसन - 2 अक्टूबर 2014
➨ सांसद आदर्श ग्राम योजना - 11 अक्टूबर 2014
➨ श्रमेव जयते - 16 अक्टूबर 201
➨ जीवन प्रमाण(पेंसन भोगियों के लिए) - 10 नवम्बर 2014
➨ मिसन इंद्र धनुष(टीकाकरण) - 25दिसम्बर 2014
➨ निति(NITI) आयोग - 1 जनवरी 2015
➨ पहल(प्रत्यक्ष हस्तांतरण) - 1 जनवरी 2015
➨ ह्रदय(समृध्दसांस्कृतिक विरासत संरक्षण व कायाकल्प) - 21जनवरी 2015
➨ बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ - 22 जनवरी 2015
➨ सुकन्या समृध्धि योजना - 22 जनवरी 2015
➨ मृदा स्वास्थ कार्ड - 19 फरवरी 2015
➨ प्रधानमंत्रीकौशल विकाश - 20 फरवरी 2015
➨ प्रधानमंत्रीजीवन ज्योति - 9 मई 2015
➨ प्रधानमंत्रीसुरक्षा बीमा - 9 मई 2015
➨ अटल पेंसन योजना~9 मई 2015
➨ उस्ताद(usttad)(अल्पसंख्यक कारीगर) - 14 मई 2015
➨ कायाकल्प(जन स्वास्थ) - 15 मई 2015
➨ डीडी किसान चैनल - 26मई 2015

रविवार, 24 जनवरी 2016

जैन धर्म - इतिहास की नजर में
दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि वैदिक साहित्य में जिन यतियों और व्रात्यों का उल्लेख मिलता है वे ब्राह्मण परंपरा के न होकर श्रमण परंपरा के ही थे। मनुस्मृति में लिच्छवि, नाथ, मल्ल आदि क्षत्रियों को व्रात्यों में गिना है।
जैन धर्म का मूल भारत की प्राचीन परंपराओं में रहा है। आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है। महाभारतकाल में इस धर्म के प्रमुख नेमिनाथ थे।
जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर अरिष्ट नेमिनाथ भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे। जैन धर्म ने कृष्ण को उनके त्रैसष्ठ शलाका पुरुषों में शामिल किया है, जो बारह नारायणों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि अगली चौबीसी में कृष्ण जैनियों के प्रथम तीर्थंकर होंगे।
ईपू आठवीं सदी में 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए, जिनका जन्म काशी में हुआ था। काशी के पास ही 11वें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ का जन्म भी हुआ था। इन्हीं के नाम पर सारनाथ का नाम प्रचलित है।
भगवान पार्श्वनाथ तक यह परंपरा कभी संगठित रूप में अस्तित्व में नहीं आई। पार्श्वनाथ से पार्श्वनाथ संप्रदाय की शुरुआत हुई और इस परंपरा को एक संगठित रूप मिला। भगवान महावीर पार्श्वनाथ संप्रदाय से ही थे।
जैन धर्म में श्रमण संप्रदाय का पहला संप्रदाय पार्श्वनाथ ने ही खड़ा किया था। ये श्रमण वैदिक परंपरा के विरुद्ध थे। यही से जैन धर्म ने अपना अगल अस्तित्व गढ़ना शुरू कर दिया था। महावीर तथा बुद्ध के काल में ये श्रमण कुछ बौद्ध तथा कुछ जैन हो गए। इन दोनों ने अलग-अलग अपनी शाखाएं बना ली।
ईपू 599 में अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने तीर्थंकरों के धर्म और परंपरा को सुव्यवस्थित रूप दिया। कैवल्य का राजपथ निर्मित किया। संघ-व्यवस्था का निर्माण किया:- मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका। यही उनका चतुर्विघ संघ कहलाया। भगवान महावीर ने 72 वर्ष की आयु में देह त्याग किया।
भगवान महावीर के काल में ही विदेहियों और श्रमणों की इस परंपरा का नाम जिन (जैन) पड़ा, अर्थात जो अपनी इंद्रियों को जीत लें।
धर्म पर मतभेद : अशोक के अभिलेखों से यह पता चलता है कि उनके समय में मगध में जैन धर्म का प्रचार था। लगभग इसी समय, मठों में बसने वाले जैन मुनियों में यह मतभेद शुरू हुआ कि तीर्थंकरों की मूर्तियां कपड़े पहनाकर रखी जाए या नग्न अवस्था में। इस बात पर भी मतभेद था कि जैन मुनियों को वस्त्र पहनना चाहिए या नहीं।
आगे चलकर यह मतभेद और भी बढ़ गया। ईसा की पहली सदी में आकर जैन धर्म को मानने वाले मुनि दो दलों में बंट गए। एक दल श्वेतांबर कहलाया, जिनके साधु सफेद वस्त्र (कपड़े) पहनते थे, और दूसरा दल दिगंबर कहलाया जिसके साधु नग्न (बिना कपड़े के) ही रहते थे।
श्वेतांबर और दिगंबर का परिचय : भगवान महावीर ने जैन धर्म की धारा को व्यवस्थित करने का कार्य किया, लेकिन उनके बाद जैन धर्म मूलत: दो संप्रदायों में विभक्त हो गया: श्वेतांबर और दिगंबर।
दोनों संप्रदायों में मतभेद दार्शनिक सिद्धांतों से ज्यादा चरित्र को लेकर है। दिगंबर आचरण पालन में अधिक कठोर हैं जबकि श्वेतांबर कुछ उदार हैं। श्वेतांबर संप्रदाय के मुनि श्वेत वस्त्र पहनते हैं जबकि दिगंबर मुनि निर्वस्त्र रहकर साधना करते हैं। यह नियम केवल मुनियों पर लागू होता है।
दिगंबर संप्रदाय मानता है कि मूल आगम ग्रंथ लुप्त हो चुके हैं, कैवल्य ज्ञान प्राप्त होने पर सिद्ध को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती और स्त्री शरीर से कैवल्य ज्ञान संभव नहीं; किंतु श्वेतांबर संप्रदाय ऐसा नहीं मानते हैं।
दिगंबरों की तीन शाखा हैं मंदिरमार्गी, मूर्तिपूजक और तेरापंथी, और श्वेतांबरों की मंदिरमार्गी तथा स्थानकवासी दो शाखाएं हैं।
दिगंबर संप्रदाय के मुनि वस्त्र नहीं पहनते। 'दिग्‌' माने दिशा। दिशा ही अंबर है, जिसका वह 'दिगंबर'। वेदों में भी इन्हें 'वातरशना' कहा है। जबकि श्वेतांबर संप्रदाय के मुनि सफेद वस्त्र धारण करते हैं। कोई 300 साल पहले श्वेतांबरों में ही एक शाखा और निकली 'स्थानकवासी'। ये लोग मूर्तियों को नहीं पूजते।
जैनियों की तेरहपंथी, बीसपंथी, तारणपंथी, यापनीय आदि कुछ और भी उपशाखाएं हैं। जैन धर्म की सभी शाखाओं में थोड़ा-बहुत मतभेद होने के बावजूद भगवान महावीर तथा अहिंसा, संयम और अनेकांतवाद में सबका समान विश्वास है।
गुप्त काल : ईसा की पहली शताब्दी में कलिंग के राजा खारावेल ने जैन धर्म स्वीकार किया। ईसा के प्रारंभिक काल में उत्तर भारत में मथुरा और दक्षिण भारत में मैसूर जैन धर्म के बहुत बड़े केंद्र थे।
पांचवीं से बारहवीं शताब्दी तक दक्षिण के गंग, कदम्बु, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों ने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन राजाओं के यहां अनेक जैन मुनियों, कवियों को आश्रय एवं सहायता प्राप्त होती थी।
ग्याहरवीं सदी के आसपास चालुक्य वंश के राजा सिद्धराज और उनके पुत्र कुमारपाल ने जैन धर्म को राजधर्म घोषित कर दिया तथा गुजरात में उसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया।
मुगल काल : मुगल शासन काल में हिन्दू, जैन और बौद्ध मंदिरों को आक्रमणकारी मुस्लिमों ने निशाना बनाकर लगभग 70 फीसदी मंदिरों का नामोनिशान मिटा दिया। दहशत के माहौल में धीरे-धीरे जैनियों के मठ टूटने एवं बिखरने लगे लेकिन फिर भी जै‍न धर्म को समाज के लोगों ने संगठित होकर बचाए रखा। जैन धर्म के लोगों का भारतीय संस्कृति, सभ्यता और समाज को विकसित करने में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
जैन धर्म - इतिहास की नजर में
दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि वैदिक साहित्य में जिन यतियों और व्रात्यों का उल्लेख मिलता है वे ब्राह्मण परंपरा के न होकर श्रमण परंपरा के ही थे। मनुस्मृति में लिच्छवि, नाथ, मल्ल आदि क्षत्रियों को व्रात्यों में गिना है।
जैन धर्म का मूल भारत की प्राचीन परंपराओं में रहा है। आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है। महाभारतकाल में इस धर्म के प्रमुख नेमिनाथ थे।
जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर अरिष्ट नेमिनाथ भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे। जैन धर्म ने कृष्ण को उनके त्रैसष्ठ शलाका पुरुषों में शामिल किया है, जो बारह नारायणों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि अगली चौबीसी में कृष्ण जैनियों के प्रथम तीर्थंकर होंगे।
ईपू आठवीं सदी में 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए, जिनका जन्म काशी में हुआ था। काशी के पास ही 11वें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ का जन्म भी हुआ था। इन्हीं के नाम पर सारनाथ का नाम प्रचलित है।
भगवान पार्श्वनाथ तक यह परंपरा कभी संगठित रूप में अस्तित्व में नहीं आई। पार्श्वनाथ से पार्श्वनाथ संप्रदाय की शुरुआत हुई और इस परंपरा को एक संगठित रूप मिला। भगवान महावीर पार्श्वनाथ संप्रदाय से ही थे।
जैन धर्म में श्रमण संप्रदाय का पहला संप्रदाय पार्श्वनाथ ने ही खड़ा किया था। ये श्रमण वैदिक परंपरा के विरुद्ध थे। यही से जैन धर्म ने अपना अगल अस्तित्व गढ़ना शुरू कर दिया था। महावीर तथा बुद्ध के काल में ये श्रमण कुछ बौद्ध तथा कुछ जैन हो गए। इन दोनों ने अलग-अलग अपनी शाखाएं बना ली।
ईपू 599 में अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने तीर्थंकरों के धर्म और परंपरा को सुव्यवस्थित रूप दिया। कैवल्य का राजपथ निर्मित किया। संघ-व्यवस्था का निर्माण किया:- मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका। यही उनका चतुर्विघ संघ कहलाया। भगवान महावीर ने 72 वर्ष की आयु में देह त्याग किया।
भगवान महावीर के काल में ही विदेहियों और श्रमणों की इस परंपरा का नाम जिन (जैन) पड़ा, अर्थात जो अपनी इंद्रियों को जीत लें।
धर्म पर मतभेद : अशोक के अभिलेखों से यह पता चलता है कि उनके समय में मगध में जैन धर्म का प्रचार था। लगभग इसी समय, मठों में बसने वाले जैन मुनियों में यह मतभेद शुरू हुआ कि तीर्थंकरों की मूर्तियां कपड़े पहनाकर रखी जाए या नग्न अवस्था में। इस बात पर भी मतभेद था कि जैन मुनियों को वस्त्र पहनना चाहिए या नहीं।
आगे चलकर यह मतभेद और भी बढ़ गया। ईसा की पहली सदी में आकर जैन धर्म को मानने वाले मुनि दो दलों में बंट गए। एक दल श्वेतांबर कहलाया, जिनके साधु सफेद वस्त्र (कपड़े) पहनते थे, और दूसरा दल दिगंबर कहलाया जिसके साधु नग्न (बिना कपड़े के) ही रहते थे।
श्वेतांबर और दिगंबर का परिचय : भगवान महावीर ने जैन धर्म की धारा को व्यवस्थित करने का कार्य किया, लेकिन उनके बाद जैन धर्म मूलत: दो संप्रदायों में विभक्त हो गया: श्वेतांबर और दिगंबर।
दोनों संप्रदायों में मतभेद दार्शनिक सिद्धांतों से ज्यादा चरित्र को लेकर है। दिगंबर आचरण पालन में अधिक कठोर हैं जबकि श्वेतांबर कुछ उदार हैं। श्वेतांबर संप्रदाय के मुनि श्वेत वस्त्र पहनते हैं जबकि दिगंबर मुनि निर्वस्त्र रहकर साधना करते हैं। यह नियम केवल मुनियों पर लागू होता है।
दिगंबर संप्रदाय मानता है कि मूल आगम ग्रंथ लुप्त हो चुके हैं, कैवल्य ज्ञान प्राप्त होने पर सिद्ध को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती और स्त्री शरीर से कैवल्य ज्ञान संभव नहीं; किंतु श्वेतांबर संप्रदाय ऐसा नहीं मानते हैं।
दिगंबरों की तीन शाखा हैं मंदिरमार्गी, मूर्तिपूजक और तेरापंथी, और श्वेतांबरों की मंदिरमार्गी तथा स्थानकवासी दो शाखाएं हैं।
दिगंबर संप्रदाय के मुनि वस्त्र नहीं पहनते। 'दिग्‌' माने दिशा। दिशा ही अंबर है, जिसका वह 'दिगंबर'। वेदों में भी इन्हें 'वातरशना' कहा है। जबकि श्वेतांबर संप्रदाय के मुनि सफेद वस्त्र धारण करते हैं। कोई 300 साल पहले श्वेतांबरों में ही एक शाखा और निकली 'स्थानकवासी'। ये लोग मूर्तियों को नहीं पूजते।
जैनियों की तेरहपंथी, बीसपंथी, तारणपंथी, यापनीय आदि कुछ और भी उपशाखाएं हैं। जैन धर्म की सभी शाखाओं में थोड़ा-बहुत मतभेद होने के बावजूद भगवान महावीर तथा अहिंसा, संयम और अनेकांतवाद में सबका समान विश्वास है।
गुप्त काल : ईसा की पहली शताब्दी में कलिंग के राजा खारावेल ने जैन धर्म स्वीकार किया। ईसा के प्रारंभिक काल में उत्तर भारत में मथुरा और दक्षिण भारत में मैसूर जैन धर्म के बहुत बड़े केंद्र थे।
पांचवीं से बारहवीं शताब्दी तक दक्षिण के गंग, कदम्बु, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों ने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन राजाओं के यहां अनेक जैन मुनियों, कवियों को आश्रय एवं सहायता प्राप्त होती थी।
ग्याहरवीं सदी के आसपास चालुक्य वंश के राजा सिद्धराज और उनके पुत्र कुमारपाल ने जैन धर्म को राजधर्म घोषित कर दिया तथा गुजरात में उसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया।
मुगल काल : मुगल शासन काल में हिन्दू, जैन और बौद्ध मंदिरों को आक्रमणकारी मुस्लिमों ने निशाना बनाकर लगभग 70 फीसदी मंदिरों का नामोनिशान मिटा दिया। दहशत के माहौल में धीरे-धीरे जैनियों के मठ टूटने एवं बिखरने लगे लेकिन फिर भी जै‍न धर्म को समाज के लोगों ने संगठित होकर बचाए रखा। जैन धर्म के लोगों का भारतीय संस्कृति, सभ्यता और समाज को विकसित करने में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

एल-नीनो


एल-नीनो -एक परिचय

एल नीनो (अंग्रेज़ी: El Nino) प्रशांत महासागर के भूमध्यीय क्षेत्र की उस समुद्री घटना का नाम है, जो दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वाडोर और पेरु देशों के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतराल पर घटित होती है। यह समुद्र में होने वाली उथल-पुथल है और इससे समुद्र के सतही जल का ताप सामान्य से अधिक हो जाता है।
एल-नीनो स्पैनिश भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है- शिशु यानी छोटा बालक। वैज्ञानिक अर्थ में, एल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यीय क्षेत्र की उस समुद्री घटना का नाम है जो दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वाडोर और पेरु देशों के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतराल पर घटित होती है। यह समुद्र में होने वाली उथलपुथल है और इससे समुद्र के सतही जल का ताप सामान्य से अधिक हो जाता है। अक्सर इसकी शुरूआत दिसंबर में क्रिसमस के आस-पास होती है। ये ईसा मसीह के जन्म का समय है। और शायद इसी कारण इस घटना का नाम एल-नीनो पड़ गया जो शिशु ईसा का प्रतीक है।
जब समुद्र का सतही जल ज्यादा गर्म होने लगता है तो वह सतह पर ही रहता है। इस घटना के तहत समुद्र के नीचे का पानी ऊपर आने के प्राकृतिक क्रम में रुकावट पैदा होती है। सामान्यत: समुद्र में गहराई से ऊपर आने वाला जल अपने साथ काफी मात्रा में मछलियों के लिए खाद्य पदार्थ लाता है। यह क्रिया एल-नीनो के कारण रुक जाती है। इससे मछलियां मरने लगती हैं और मछुआरों के लिए यह समय सबसे दुखदायी होता है। एक बार शुरू होने पर यह प्रक्रिया कई सप्ताह या महीनों चलती है। एल-नीनो अक्सर दस साल में दो बार आती है और कभी-कभी तीन बार भी। एल-नीनो हवाओं के दिशा बदलने, कमजोर पड़ने तथा समुद्र के सतही जल के ताप में बढ़ोतरी की विशेष भूमिका निभाती है। एल-नीनो का एक प्रभाव यह होता है कि वर्षा के प्रमुख क्षेत्र बदल जाते हैं। परिणामस्वरूप विश्व के ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्यादा वर्षा होने लगती है। कभी-कभी इसके विपरीत भी होता है।
ऊष्ण कटिबंधीय प्रशांत में समुद्र तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में आये बदलाव को एल नीनो कहा जाता है जो पूरे विश्व के मौसम को अस्त-व्यस्त कर देता है। यह बार-बार घटित होने वाली मौसमी घटना है जो प्रमुख रूप से दक्षिण अमेरिका के प्रशान्त तट को प्रभावित करता है परंतु इस का समूचे विश्व के मौसम पर नाटकीय प्रभाव पड़ता है।
‘एल-नीनो’ के रूप में उच्चरित इस शब्द का स्पैनिश भाषा में अर्थ होता है ‘बालक’ एवं इसे ऐसा नाम पेरू के मछुआरों द्वारा बाल ईसा के नाम पर किया गया है क्योंकि ईसका प्रभाव सामान्यतः क्रिसमस के आस-पास अनुभव किया जाता है। इसमें प्रशांत महासागर का जल आवधिक रूप से गर्म होता है जिसका परिणाम मौसम की अत्यंतता के रूप में होता है। एल नीनो का सटीक कारण, तीव्रता एवं अवधि की सही-सही जानकारी नहीं है। गर्म एल नीनो की अवस्था सामान्यतः लगभग 8-10 महीनों तक बनी रहती है।

एलनीनो - एक प्राकृतिक भौगोलिक घटना

सामान्यतः, व्यापारिक हवाएं गर्म सतही जल को दक्षिण अमेरिकी तट से दूर ऑस्ट्रेलिया एवं फिलीपींस की ओर धकेलते हुए प्रशांत महासागर के किनारे-किनारे पश्चिम की ओर बहती है। पेरू के तट के पास जल ठंडा होता है एवं पोषक-तत्वों से समृद्ध होता है जो कि प्राथमिक उत्पादकों, विविध समुद्री पारिस्थिक तंत्रों एवं प्रमुख मछलियों को जीवन प्रदान करता है। एल नीनो के दौरान, व्यापारिक पवनें मध्य एवं पश्चिमी प्रशांत महासागर में शांत होती है। इससे गर्म जल को सतह पर जमा होने में मदद मिलती है जिसके कारण ठंडे जल के जमाव के कारण पैदा हुए पोषक तत्वों को नीचे खिसकना पड़ता है और प्लवक जीवों एवं अन्य जलीय जीवों जैसे मछलियों का नाश होता है तथा अनेक समुद्री पक्षियों को भोजन की कमी होती है। इसे एल नीनो प्रभाव कहा जाता है जोकि विश्वव्यापी मौसम पद्धतियों के विनाशकारी व्यवधानों के लिए जिम्मेदार है। 
अनेक विनाशों का कारण एल नीनो माना गया है, जैसे इंडोनेशिया में 1983 में पड़ा अकाल, सूखे के कारण ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग, कैलिफोर्निया में भारी बारिश एवं पेरू के तट पर एंकोवी मत्स्य क्षेत्र का विनाश। ऐसा माना जाता है कि 1982/83 के दौरान इसके कारण समूचे विश्व में 2000 व्यक्तियों की मौत हुई एवं 12 अरब डॉलर की हानि हुई।

एलनीनो के प्रभाव

1997/98 में इस का प्रभाव बहुत नुकसानदायी था। अमेरिका में बाढ़ से तबाही हुई, चीन में आंधी से नुकसान हुआ, ऑस्ट्रिया सूखे से झुलस गया एवं जंगली आग ने दक्षिण-पूर्व एशिया एवं ब्राजील के आंशिक भागों को जला डाला। इंडोनेशिया में पिछले 50 वर्षों में सबसे कठिन सूखे की स्थिति देखने में आई एवं मैक्सिको में 1881 के बाद पहली बार गौडालाजारा में बर्फबारी हुई। हिन्द महासागर में मानसूनी पवनों का चक्र इससे प्रभावित हुआ। 
जब प्रशांत महासागर में दबाव की उपस्थिति अत्यधिक हो जाती है तब यह हिन्द महासागर में अफ्रीका से ऑस्ट्रेलिया की ओर कम होने लगता है। यह प्रथम घटना थी जिससे यह पता चला कि ऊष्णकटिबंधी प्रशांत क्षेत्र के अन्दर तथा इसके बाहर आये परिवर्तन एक पृथक घटना नहीं बल्कि एक बहुत बड़े प्रदोलन के भाग के रूप में घटित हुए हैं।
स्त्रोत:
इंडिया वाटर पोर्टल

प्‍लास्टिक क्‍या है?

प्‍लास्टिक, पॉलिमर्स हैं जो कि ऐसे बडे़ अणु होते हैं जिनमें मोनोमर्स नामक रिपीटिंग यूनिट्स होती हैं। प्‍लास्टिक बैग की जब बात की जाती है तो रिपीटिंग यूनिट्स एथिलीन होती हैं। जब एथिलीन अणुओं को पॉलिथिलीन बनाने के लिए पॉजिमराइज्‍ड किया जाता है तो वे कार्बन अणुओं की एक लंबी श्रृंखला बनाते हैं। इनमें प्रत्‍येक कार्बन दो हाइड्रोजन अणुओं के साथ जुड़ा होता है।

प्‍लास्टिक के थैले किसके बनते हैं?

प्‍लास्टिक के थैले पॉलिमर्स के तीन प्रकारों में से एक द्वारा बनती हैं - पॉलिथिलीन- हाई डेंसिटी पॉलिथिलीन (एचडीपीई), लो डेंसिटी पॉलिथिलीन (एलडीपीई), या लीनियर लो-डेंसिटी पॉलिथिलीन (एलएलडीपीई)। किराने की थैलियां अधिकतर एचडीपीई द्वारा बनाई जाती हैं और थैले ड्राई क्‍लीनर एलडीपीई से। इन दोनों में सबसे बड़ा अंतर पॉलिमर श्रृंखला की ब्रांचिंग की डिग्री का है। एचडीपीई और एलएलडीपीई में रैखिक अशाखित श्रृंखला होती हैं वहीं एलडीपीई शाखित होती हैं।

कोपेनहेगन संयुक्त राष्ट्र मौसम परिवर्तन सम्मेलन

तापमान वृद्धि रोकने, उत्सर्जन घटाने तथा वित्त जुटाने का राजनीतिक समझौता
कोपेनहेगन में संयुक्त राष्ट्र मौसम परिवर्तन सम्मेलन, उत्सर्जन में अर्थपूर्ण कमी के लिए वैश्विक तापमान वृद्धि रोकने के लिए देशों के बीच समझौते तथा मौसम परिवर्तन से मुकाबले के लिए विकासशील दुनिया में गतिविधियां आरम्भ करने हेतु वित्त जुटाने की प्रतिबद्धता के साथ सम्पन्न हुआ।
सम्मेलन में विश्व के नेता ‘कोपेनहेगन’ समझौते पर सहमत हुए, जिसका अधिकांश देशों ने समर्थन किया। ‘कोपेनहेगन समझौता’ इस बात को मान्यता देता है कि मौसम परिवर्तन के सबसे खराब प्रभावों पर अंकुश लगाने के लिए वैश्विक तापमान में 2 डिग्री से कम की वृद्धि होनी चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, समझौता यह उल्लिखित करता है कि औद्योगीकृत देश अकेले या संयुक्त रूप से, 2020 से पूरे अर्थतंत्र में मापनेयोग्य उत्सर्जन लक्ष्यों को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध होंगे, जिन्हें 31 जनवरी 2010 से पहले समझौते में सूचीबद्ध किया जाना है।
बढते अर्थतंत्र वाले प्रमुख देशों के साथ कई विकासशील देशों ने प्रति दो वर्षों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन सीमित करने के उनके प्रयासों की जानकारी देने पर सहमति जताई, उनकी स्वैच्छिक शपथ को 31 जनवरी 2010 से पूर्व सूचीबद्ध करना है।

जलवायु परिवर्तन

हमें गर्मी के मौसम में गर्मी व सर्दी के मौसम में ठण्ड लगती है। ये सब कुछ मौसम में होने वाले बदलाव के कारण होता है। मौसम, किसी भी स्थान की औसत जलवायु होती है जिसे कुछ समयावधि के लिये वहां अनुभव किया जाता है। इस मौसम को तय करने वाले मानकों में वर्षा, सूर्य प्रकाश, हवा, नमी व तापमान प्रमुख हैं।
मौसम में बदलाव काफी जल्दी होता है लेकिन जलवायु में बदलाव आने में काफी समय लगता है और इसीलिये ये कम दिखाई देते हैं। इस समय पृथ्वी के जलवायु में परिवर्तन हो रहा है और सभी जीवित प्राणियों ने इस बदलाव के साथ सामंजस्य भी बैठा लिया है। 
परंतु, पिछले 150-200 वर्षों में ये जलवायु परिवर्तन इतनी तेजी से हुआ है कि प्राणी व वनस्पति जगत को इस बदलाव के साथ सामंजस्य बैठा पाने में मुश्किल हो रहा है। इस परिवर्तन के लिये एक प्रकार से मानवीय क्रिया-कलाप ही जिम्मेदार है।

जलवायु परिवर्तन के कारण

जलवायु परिवर्तन के कारणों को दो बागों में बांटा जा सकता है- प्राकृतिक व मानव निर्मित
I. प्राकृतिक कारण
जलवायु परिवर्तन के लिये अनेक प्राकृतिक कारण जिम्मेदार हैं। इनमें से प्रमुख हैं- महाद्वीपों का खिसकना, ज्वालामुखी, समुद्री तरंगें और धरती का घुमाव।
  • महाद्वीपों का खिसकना
हम आज जिन महाद्वीपों को देख रहे हैं, वे इस धरा की उत्पत्ति के साथ ही बने थे तथा इनपर समुद्र में तैरते रहने के कारण तथा वायु के प्रवाह के कारण इनका खिसकना निरंतर जारी है। इस प्रकार की हलचल से समुद्र में तरंगें व वायु प्रवाह उत्पन्न होता है। इस प्रकार के बदलावों से जलवायु में परिवर्तन होते हैं। इस प्रकार से महाद्वीपों का खिसकना आज भी जारी है।
  • ज्वालामुखी
जब भी कोई ज्वालामुखी फूटता है, वह काफी मात्रा में सल्फरडाई ऑक्साइड, पानी, धूलकण और राख के कणों का वातावरण में उत्सर्जन करता है। भले ही ज्वालामुखी थोड़े दिनों तक ही काम करें लेकिन इस दौरान काफी ज्यादा मात्रा में निकली हुई गैसें, जलवायु को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है। गैस व धूल कण सूर्य की किरणों का मार्ग अवरूद्ध कर देते हैं, फलस्वरूप वातावरण का तापमान कम हो जाता है।
  • पृथ्वी का झुकाव
धरती 23.5 डिग्री के कोण पर, अपनी कक्षा में झुकी हुई है। इसके इस झुकाव में परिवर्तन से मौसम के क्रम में परिवर्तन होता है। अधिक झुकाव का अर्थ है अधिक गर्मी व अधिक सर्दी और कम झुकाव का अर्थ है कम मात्रा में गर्मी व साधारण सर्दी।
  • समुद्री तरंगें
समुद्र, जलवायु का एक प्रमुख भाग है। वे पृथ्वी के 71 प्रतिशत भाग पर फैले हुए हैं। समुद्र द्वारा पृथ्वी की सतह की अपेक्षा दुगुनी दर से सूर्य की किरणों का अवशोषण किया जाता है। समुद्री तरंगों के माध्यम से संपूर्ण पृथ्वी पर काफी बड़ी मात्रा में ऊष्मा का प्रसार होता है।
II. मानवीय कारण
ग्रीन हाउस प्रभाव
पृथ्वी द्वारा सूर्य से ऊर्जा ग्रहण की जाती है जिसके चलते धरती की सतह गर्म हो जाती है। जब ये ऊर्जा वातावरण से होकर गुज़रती है, तो कुछ मात्रा में, लगभग 30 प्रतिशत ऊर्जा वातावरण में ही रह जाती है। इस ऊर्जा का कुछ भाग धरती की सतह तथा समुद्र के ज़रिये परावर्तित होकर पुनः वातावरण में चला जाता है। वातावरण की कुछ गैसों द्वारा पूरी पृथ्वी पर एक परत सी बना ली जाती है व वे इस ऊर्जा का कुछ भाग भी सोख लेते हैं। इन गैसों में शामिल होती है कार्बन डाईऑक्साइड, मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइड व जल कण, जो वातावरण के 1 प्रतिशत से भी कम भाग में होते है। इन गैसों को ग्रीन हाउस गैसें भी कहते हैं। जिस प्रकार से हरे रंग का कांच ऊष्मा को अन्दर आने से रोकता है, कुछ इसी प्रकार से ये गैसें, पृथ्वी के ऊपर एक परत बनाकर अधिक ऊष्मा से इसकी रक्षा करती है। इसी कारण इसे ग्रीन हाउस प्रभाव कहा जाता है।
ग्रीन हाउस प्रभाव को सबसे पहले फ्रांस के वैज्ञानिक जीन बैप्टिस्ट फुरियर ने पहचाना था। इन्होंने ग्रीन हाउस व वातावरण में होने वाले समान कार्य के मध्य संबंध को दर्शाया था।
ग्रीन हाउस गैसों की परत पृथ्वी पर इसकी उत्पत्ति के समय से है। चूंकि अधिक मानवीय क्रिया-कलापों के कारण इस प्रकार की अधिकाधिक गैसें वातावरण में छोड़ी जा रही है जिससे ये परत मोटी होती जा रही है व प्राकृतिक ग्रीन हाउस का प्रभाव समाप्त हो रहा है।
कार्बन डाईऑक्साइड तब बनती है जब हम किसी भी प्रकार का ईंधन जलाते हैं, जैसे- कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस आदि। इसके बाद हम वृक्षों को भी नष्ट कर रहे है, ऐसे में वृक्षों में संचित कार्बन डाईऑक्साइड भी वातावरण में जा मिलती है। खेती के कामों में वृद्धि, ज़मीन के उपयोग में विविधता व अन्य कई स्रोतों के कारण वातावरण में मिथेन और नाइट्रस ऑक्साइड गैस का स्राव भी अधिक मात्रा में होता है। औद्योगिक कारणों से भी नवीन ग्रीन हाउस प्रभाव की गैसें वातावरण में स्रावित हो रही है, जैसे क्लोरोफ्लोरोकार्बन, जबकि ऑटोमोबाईल से निकलने वाले धुंए के कारण ओज़ोन परत के निर्माण से संबद्ध गैसें निकलती है। इस प्रकार के परिवर्तनों से सामान्यतः वैश्विक तापन अथवा जलवायु में परिवर्तन जैसे परिणाम परिलक्षित होते हैं।
हम ग्रीन हाउस गैसों में किस प्रकार अपना योगदान देते हैं?
  • कोयला, पेट्रोल आदि जीवाष्म ईंधन का उपयोग कर
  • अधिक ज़मीन की चाहत में हम पेड़ों को काटकर
  • अपघटित न हो सकने वाले समान अर्थात प्लास्टिक का अधिकाधिक उपयोग कर
  • खेती में उर्वरक व कीटनाशकों का अधिकाधिक प्रयोग कर

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

जलवायु परिवर्तन से मानव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 19 वीं सदी के बाद से पृथ्वी की सतह का सकल तापमान 03 से 06 डिग्री तक बढ़ ग़या है। ये तापमान में वृद्धि के आंकड़े हमें मामूली लग सकते हैं लेकिन ये आगे चलकर महाविनाश को आकार देंगे, जैसा कि नीचे बताया गया है-
(क) खेती
बढ़ती जनसंख्या के कारण भोजन की मांग में भी वृद्धि हुई है। इससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बनता है। जलवायु में परिवर्तन का सीधा प्रभाव खेती पर पडेग़ा क्योंकि तापमान, वर्षा आदि में बदलाव आने से मिट्टी की क्षमता, कीटाणु और फैलने वाली बीमारियां अपने सामान्य तरीके से अलग प्रसारित होंगी। यह भी कहा जा रहा है कि भारत में दलहन का उत्पादन कम हो रहा है। अति जलवायु परिवर्तन जैसे तापमान में वृद्धि के परिमाणस्वरूप आने वाले बाढ़ आदि से खेती का नुकसान बढ़ेगा।
(ख) मौसम 
गर्म मौसम होने से वर्षा का चक्र प्रभावित होता है, इससे बाढ़ या सूखे का खतरा भी हो सकता है, ध्रुवीय ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र के स्तर में वृद्धि की भी आशंका हो सकती है। पिछले वर्ष के तूफानों व बवंडरों ने अप्रत्यक्ष रूप से इसके संकेत दे दिये है।
(ग) समुद्र के जल-स्तर में वृद्धि
जलवायु परिवर्तन का एक और प्रमुख कारक है समुद्र के जल-स्तर में वृद्धि। समुद्र के गर्म होने, ग्लेशियरों के पिघलने से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाली आधी सदी के भीतर समुद्र के जल-स्तर में लगभग आधे मीटर की वृद्धि होगी। समुद्र के स्तर में वृद्धि होने के अनेकानेक दुष्परिणाम सामने आएंगे जैसे तटीय क्षेत्रों की बर्बादी, ज़मीन का पानी में जाना, बाढ़, मिट्टी का अपरदन, खारे पानी के दुष्परिणाम आदि। इससे तटीय जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा, खेती, पेय जल, मत्स्य पालन व मानव बसाव तहस नहस हो जाएगी।
(घ) स्वास्थ्य
वैश्विक ताप का मानवीय स्वास्थ्य पर भी सीधा असर होगा, इससे गर्मी से संबंधित बीमारियां, निर्जलीकरण, संक्रामक बीमारियों का प्रसार, कुपोषण और मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव होगा।
(ङ) जंगल और वन्य जीवन 
प्राणी व पशु, ये प्राकृतिक वातावरण में रहने वाले हैं व ये जलवायु परिवर्तन के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं। यदि जलवायु में परिवर्तन का ये दौर इसी प्रकार से चलता रहा, तो कई जानवर व पौधे समाप्ति की कगार पर पहुंच जाएंगे।

सुरक्षात्मक उपाय

  • जीवाष्म ईंधन के उपयोग में कमी की जाए
  • प्राकृतिक ऊर्जा के स्रोतों को अपनाया जाए, जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि
  • पेड़ों को बचाया जाए व अधिक वृक्षारोपण किया जाए
  • प्लास्टिक जैसे अपघटन में कठिन व असंभव पदार्थ का उपयोग न किया जाए

वाटर फुटप्रिंट-एक परिचय

पर्यावरण के प्रति जागरुकता और उसके बचाने के प्रयासों के बीच पर्यावरणीय क्षति को प्रत्येक मानव के स्तर पर जानने के प्रयास जारी है। कार्बन की खपत का पता लगाने के लिए कार्बन फुटप्रिंट की अवधारणा का विकास किया गया। इसी प्रकार विभिन्न मानवीय गतिविधियों की संलग्नता के अनुसार पानी की प्रति मानव के अनुसार खपत पता लगाने के लिए वाटर फुटप्रिंट की अवधारणा प्रकाश में आई जिसकी जानकारी यहाँ दी जा रही है।
परिचय
अपने वाटर फुटप्रिंट की गणना कर, आप पता लगा सकते हैं कि आपकी जिंदगी जीने के तरीके से विश्व के जल स्रोतों की कैसे खपत हो रही है। हालाँकि अभी भी बहुत से पश्चिमी देशों में पानी की अधिकांश प्रचुरता है, हमारे प्रतिदिन के बहुत से उत्पादों में आभासी या छुपा जल शामिल होता है। आभासी पानी का उपभोग उन देशों में किया जाता है जहाँ पानी की कमी है। उदाहरण के लिए, एक कप कॉफी के उत्पादन में प्रयोग किए जाने वाले आभासी पानी की मात्रा 140 लीटर तक होती है। आपके वाटर फुटप्रिंट केवल आपके द्वारा प्रयोग किए गए प्रत्यक्ष पानी (उदाहरण के लिए, धुलाई में) को ही नहीं दिखाते, बल्कि आपके द्वारा उपभोग किए गए आभासी पानी की मात्रा को भी दर्शाते हैं।
आपका वाटर फुटप्रिंट
...जितना आप सोचते हैं उससे कहीं अधिक है... केवल पीने के लिए, नहाने के लिए या कपड़े धोने के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी ही आपके खाते में नहीं आता। आप जो कपड़े, जूते पहनते हैं, ईंधन इस्तेमाल करते हैं, उसके निर्माण में लगने वाला पानी भी आपके द्वारा की गई खपत में जुड़ता है। प्रतिदिन आप कितना पानी इस्तेमाल कर रहे हैं, इसकी जानकारी होना बेहद जरूरी है। देखिए, किन चीजों में कितना पानी खर्च हो रहा है और क्या है आपका वॉटर फुटप्रिंट।

Water Foot Print
वैश्विक ताप वृद्धि क्या है ?
सरल शब्दों में वैश्विक तापवृद्धि या ग्लोबल वार्मिंग का मतलब है, धरती के औसत तापमान में बढ़ोतरी हो जाना, ये दरअसल इंसानी गतिविधियों के कारण हुआ माना जाता है, जैसे कि जीवाश्म आधारित इंधन पेट्रोल, डीजल का अत्यधिक इस्तेमाल, जंगलों की कटाई, क्लोरो फ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन और अन्य अनेकों तरीकों से पारंपरिक ऊर्जा का अत्यधिक उपयोग और बर्बादी. इन सबका सीधा एक ही मतलब है कि प्राकृतिक संसाधनों के अत्यदिक उपयोग से वैश्विक तापमान वृद्धि का सम्बन्ध है. जीवाश्म इंधनों के जलने से कार्बन डाई-आक्साइड सहित अन्य हानिकारक गैसें वायुमंडल में बढ़ती जाती हैं. ये गैसें धरती के तापमान को बढाती हैं. इस कारण गर्मी का मौसम पहले की तुलना में अधिक गर्म होता जा रहा है, समुद्र जल स्तर बढ़ता जा रहा है, और ध्रुवों पर बर्फ पिघल रही है.

कुबेरनाथ राय   (1933 — 1996) कृतियाँ प्रिया नीलकंठी   ( 1969 ) प्रथम निबंध संग्रह  रस आखेटक   ( 1971  ) गंधमादन   ( 1972 ) वि...